March 24, 2026

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बिहार : युवा लहू में जहर बनकर फैल रहा हेपेटाइटिस, स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट ने उड़ाई नींद, जांच में आंकड़े चौंकाने वाले

  • एक ही सुई, टैटू का फैशन और लापरवाही से लीवर को निगल रही है बीमारी, नवादा, पटना, मुंगेर और समस्तीपुर हॉटस्पॉट

अरुण शाही, मुजफ्फरपुर (बिहार)

राज्य में हेपेटाइटिस अब किसी छुपी बीमारी का नाम नहीं रह गया है, बल्कि यह युवाओं के बीच एक साइलेंट किलर बन चुका है। बीमारी इतनी तेजी से पैर पसार रही है कि हर 100 में से लगभग 33 लोग इसके शिकार पाए गए हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि संक्रमितों में बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की है, जो पूरी तरह स्वस्थ दिखाई देते हैं, लेकिन भीतर से उनका लिवर इस वायरस के सामने घुटने टेक चुका होता है।

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आईवी ड्रग्स का बढ़ता चलन, टैटू बनवाने की अंधी होड़ और असुरक्षित यौन संबंध जैसी जीवनशैली की आदतों ने बीमारी को फैलाने में घी का काम किया है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में टैटू बनवाना संक्रमण का सबसे बड़ा जरिया बनता जा रहा है, जहां आमतौर पर स्वच्छता की अनदेखी होती है।

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स्वास्थ्य विभाग की ताजा रिपोर्ट ने राज्य की नींद उड़ा दी है। 10 लाख 53 हजार 953 लोगों की जांच में 8223 लोग हेपेटाइटिस बी पॉजिटिव पाए गए हैं। वहीं 2 लाख 66 हजार 358 लोगों की जांच में 1041 लोग हेपेटाइटिस सी से संक्रमित मिले हैं। चिंताजनक यह है कि इनमें से करीब 80% मरीजों को शुरुआती अवस्था में कोई लक्षण नहीं थे।

एसकेएमसीएच, मुजफ्फरपुर के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. अमितेश कुमार बताते हैं कि युवा वर्ग में एक ही सुई से ड्रग्स लेना अब आम हो गया है। टैटू बनवाने का चलन तेजी से बढ़ा है, लेकिन इसकी कीमत कई बार लिवर की सेहत से चुकानी पड़ रही है। संक्रमित सुई से टैटू बनवाने पर वायरस सीधे खून में पहुंच जाता है। यही कारण है कि ग्रामीण इलाकों में हेपेटाइटिस “बी” के अधिकतर मामले टैटू से जुड़े हुए निकल रहे हैं।

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हेपेटाइटिस “ए” और ई मुख्यतः दूषित पानी और खानपान से फैलते हैं और छह महीने में अपने आप ठीक हो जाते हैं। लेकिन हेपेटाइटिस “बी, सी और डी” वायरस शरीर के लिवर सेल्स में जाकर छिप जाते हैं और धीरे-धीरे लिवर को पूरी तरह खराब कर देते हैं। यह प्रक्रिया 15 से 20 वर्षों में लिवर सिरोसिस या कैंसर तक पहुंचा सकती है, यदि समय रहते इलाज न हो।

हेपेटाइटिस “बी” के सबसे अधिक मामले नवादा (2233) और पटना (1237) में सामने आए हैं। समस्तीपुर में 348, सिवान में 329, मुंगेर में 296, बेगूसराय में 396, भोजपुर में 148 और सीतामढ़ी में 206 मामले दर्ज किए गए हैं। पश्चिम चंपारण, जहानाबाद, रोहतास, खगड़िया, वैशाली, पूर्वी चंपारण जैसे जिलों में भी स्थिति कम चिंताजनक नहीं है। वहीं हेपेटाइटिस “सी” की बात करें तो मुंगेर 442 मरीजों के साथ सबसे आगे है, जबकि पटना में 286, भोजपुर में 66 और पश्चिम चंपारण में 64 संक्रमित पाए गए हैं।

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सबसे बड़ी समस्या यह है कि इस बीमारी के शुरुआती चरण में मरीज को कोई विशेष लक्षण नहीं होते। जब तक बीमारी सामने आती है, तब तक लिवर की स्थिति काफी बिगड़ चुकी होती है। थकान, कमजोरी, त्वचा पर पीलापन, भूख न लगना और पेट में सूजन जैसे लक्षण जब दिखते हैं, तब तक वायरस लिवर में घर बना चुका होता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस बीमारी से बचाव का सबसे सशक्त उपाय है…सतर्कता। टीकाकरण, एकल सुई का इस्तेमाल, लाइफस्टाइल में बदलाव और जागरूकता अभियान के जरिए ही हेपेटाइटिस को रोका जा सकता है। युवाओं को खासतौर पर चाहिए कि वे ड्रग्स, असुरक्षित यौन संबंधों और बिना जांचे टैटू सेंटरों से दूरी बनाएं।

अगर अब भी समाज ने नहीं जागरूकता दिखाई तो आने वाले वर्षों में लिवर की यह चुपचाप गिरती हालत राज्य के लिए महामारी जैसा संकट बन सकती है…वक्त है, चेतने का।

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