March 24, 2026

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नीतीश कुमार को जगाने वाले प्रशांत किशोर हारकर भी राजनीति जीत गए

prashant Kishor

Khabari Chiraiya Desk: जन सुराज के सुप्रीमो प्रशांत किशोर ने कोई गुनाह नहीं किया है। उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी पार्टी को लेकर जिस चुनावी भविष्यवाणी की थी, उसी ने सत्ता के गलियारों में हलचल मचा दी। उन्होंने कहा था कि जदयू को 25 से ज्यादा सीट नहीं मिलेंगी। परिणाम को देखते हुए इस बात ने मुख्यमंत्री को संभलने का अवसर दिया और अंतिम दौर में सीटों की संख्या बढ़ी। प्रशांत किशोर ने मुख्यमंत्री को सही मायनों में आईना दिखाया। वह आवाज जो एक अणे मार्ग की ऊंची दीवारों में फंस कर रह जाती थी, उसे सीधे मोर्चे से उठाकर सामने रखा गया।

2025 के विधानसभा चुनाव में जन सुराज ने जिन मुद्दों को सामने लाया, विपक्ष ने भी उन्हीं को अपने संशोधित रूप में उठाया। इन मुद्दों को लेकर नीतीश कुमार और उनकी सरकार के भीतर बेचैनी फैल गई। जन सुराज भले ही कोई सीट जीत नहीं पाई, लेकिन उस सोच और जमीनी सवालों ने चुनावी नैरेटिव बदल दिया जिन्होंने पढ़ाई, दवाई और कमाई जैसे मुद्दों को राजनीतिक बहस का केंद्र बना दिया।

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Panchayat Voice

प्रशांत किशोर ने बिहार की उस दुखती रग को छुआ, जिसे आम लोग वर्षों से झेलते आ रहे हैं। घर छोड़कर सूरत, अहमदाबाद और पंजाब में मजदूरी करने को मजबूर लाखों युवाओं की बेबसी को उन्होंने पहले बार किसी ने राजनीतिक मंच पर इतने प्रखर तरीके से रखा। साथ ही भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जो खुलासे उन्होंने किए, वह किसी सरकारी जांच एजेंसी के बूते की बात नहीं थी। सरकार में बैठे नेताओं की करतूतों पर उन्होंने प्रकाश डाला। चाहे वह स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे हों, उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी हों, या प्रदेश के कुछ अन्य प्रभावशाली नेता। यह साहसिक कदम जनता के भरोसे को जीतने वाला था।

यदि घोषणाओं और वायदों की बात करें तो इस देश में ऐसे अनगिनत वादे हैं जो कभी पूरे नहीं होते। चीनी मिलों को चालू कराने से लेकर हवाई अड्डों से उड़ान भरवाने तक। योजनाएं भाषण बन कर रह जाती हैं। न मीडिया सवाल करता है, न विपक्ष इस ढीले रवैये पर आवाज उठाता है। फिर केवल प्रशांत किशोर पर सवाल क्यों उठते हैं। उन्होंने तो यही किया कि जनता के सामने जमीनी सच को रखा।

चुनाव में हार और जीत किसी खेल की तरह ही होती है। कभी पूरा टूर्नामेंट हारने के बाद भी खिलाड़ी की शैली और साहस की चर्चा होती है। ठीक उसी तरह प्रशांत किशोर ने भी एक महत्वपूर्ण काम किया है। उन्होंने मुद्दों को राजनीति का केंद्र बनाया है। अब यह जरूरी है कि वे इसका अनुसरण जारी रखें। भ्रष्टाचार के जिन चेहरों को उन्होंने उजागर किया, वे ही नहीं, कई और भी हैं जिनके मुखौटे उतरना बाकी है।

शिक्षा क्षेत्र में भी अब समय आ गया है कि स्कूल से लेकर विश्वविद्यालयों तक की वास्तविक स्थिति सामने आए। शिक्षकों के वेतन पर सरकार कितना खर्च करती है, विश्वविद्यालयों में कितनी पढ़ाई होती है और कुलपतियों का राजमहल जैसा जीवन कब तक चलता रहेगा। जनता को पता होना चाहिए कि उनकी कमाई कहां खर्च होती है।

स्वास्थ्य क्षेत्र की स्थिति भी कोई छिपी हुई बात नहीं है। सरकारी अस्पतालों से लेकर निजी नर्सिंग होम तक लूट-खसोट का आलम है। कहीं इलाज के नाम पर लाखों रुपए मांगे जाते हैं, कहीं लाश को बिल चुकाए बिना नहीं छोड़ा जाता। ऐसे में डॉक्टर अगर निजी प्रैक्टिस करना चाहते हैं तो सरकारी अस्पताल में नौकरी क्यों करते हैं। दवाई और कमीशन का यह खेल अब किसी से छिपा नहीं है।

कमाई और पलायन बिहार की सबसे गंभीर समस्या है। अगर रोजगार घर के करीब मिल जाए तो यह राज्य किसी से पीछे नहीं रहेगा। मजदूरों की भी मौत ट्रेन में होने से बच सकेगी, क्योंकि उन्हें प्रदेश छोड़कर कमाई के लिए पंजाब हरियाणा गुजरात नहीं भागना होगा।

अंत में प्रशांत किशोर पर सवाल उठाने की बजाय उस सिस्टम पर सवाल उठना चाहिए जिसने इस राज्य के युवाओं का भविष्य और सपनों को अधूरा रखा है। प्रशांत किशोर ने सोया हुआ शेर जगाया है। अब यह जनता की जिम्मेदारी है कि इस आवाज को और मजबूत बनाए।

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