February 6, 2026

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कानपुर : रामादेवी फ्लाईओवर पर स्लीपर बस में लगी आग परिवहन व्यवस्था पर बड़ा सवाल…

  • कानपुर की स्लीपर बस में लगी आग कोई अकेली घटना नहीं, बल्कि देशभर में लगातार होने वाली ऐसी घटनाओं की भयावह श्रृंखला का हिस्सा है

✍️अजय रत्न✍️

उत्तर प्रदेश में कानपुर के रामादेवी फ्लाईओवर पर शुक्रवार सुबह हुई घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि देश की सड़क परिवहन व्यवस्था कितनी असुरक्षित और असंगठित है। स्लीपर बस में यात्रा कर रहे 43 यात्री उस वक्त गहरी नींद में थे, जब बस के ऊपर रखे सामान में अचानक आग भड़क उठी। ओवरब्रिज पर तैनात यातायात पुलिसकर्मी न पहुंचते और तत्परता न दिखाते तो यह घटना एक बड़ी त्रासदी में बदल सकती थी। सौभाग्य रहा कि किसी की जान नहीं गई, लेकिन लाखों का सामान, नकदी और निजी वस्तुएं राख में बदल गईं।

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यह घटना अपने आप में गंभीर है, लेकिन इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि ऐसे हादसे अब अपवाद नहीं रहे-लगातार कई राज्यों से चलती बसों में आग लगने की खबरें सामने आ रही हैं। कभी डीजल टैंक में रिसाव, कभी इंजन में खराबी, कभी एसी यूनिट में शॉर्ट-सर्किट तो कभी बस की छत पर अवैध तरीके से भरा सामान-कहीं न कहीं कोई न कोई लापरवाही हर बार इस खतरे को जन्म दे रही है। हर घटना के बाद जांच की बात होती है, पर न तो परिवहन कंपनियों पर कड़ा नियंत्रण दिखता है और न ही बस फिटनेस प्रणाली में कोई ठोस सुधार।

कानपुर की घटना में भी शुरुआती जानकारी बताती है कि बस के ऊपर अत्यधिक सामान रखा गया था। यह प्रथा उत्तर भारत में आम हो चुकी है, बावजूद इसके कि यह कानूनन गलत है और अत्यंत खतरनाक भी। बस स्टाफ भी अक्सर यात्रियों की आपत्ति को अनदेखा कर देता है, क्योंकि छत पर सामान भरने से उन्हें “अतिरिक्त कमाई” मिलती है। अब यह स्पष्ट है कि यह कमाई यात्रियों की जान के मूल्य पर हो रही है।

दूसरी ओर, चालक का रवैया भी बड़ा सवाल खड़ा करता है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार बस रुकते ही चालक मौके से भाग निकला। यह व्यवहार न केवल गैरजिम्मेदाराना है, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा के प्रति गहरी उदासीनता भी दर्शाता है। जिस व्यक्ति के हाथ में दर्जनों लोगों की जान होती है, उसके प्रशिक्षण और अनुशासन में इतनी कमी कैसे रह सकती है? यह परिवहन प्रबंधन की सबसे बड़ी विफलता है।

दमकल विभाग की तेज कार्रवाई और पुलिस की तत्परता ने तो इस हादसे की गंभीरता कम कर दी, पर आग के कारणों को लेकर हर बार की तरह “जांच जारी है” का बयान ही दिया गया। वर्षों से यही बयान दोहराया जा रहा है, लेकिन न तो नियमन सख्त होता है और न ही बस फिटनेस टेस्ट की प्रक्रिया पारदर्शी बनती है।

हकीकत यह है कि भारत में रोडवेज और निजी बसों की सुरक्षा व्यवस्था अभी भी तकनीक और मानकों से बहुत पीछे है। कई बसें वर्षों पुरानी हैं, उनकी वायरिंग जर्जर है, और एयरकंडीशनिंग यूनिट की सर्विसिंग शायद ही नियमित होती हो। यह सारी लापरवाहियां मिलकर हर बस को एक चलता फिरता जोखिम बना देती हैं।

यह समय है कि राज्य सरकारें और परिवहन विभाग जागें। बस कंपनियों पर सख्त दंड, ओवरलोडिंग पर तत्काल कार्रवाई, बस फिटनेस में तकनीकी सुधार और चालकों की अनिवार्य ट्रेनिंग-ये कदम अब टाले नहीं जा सकते। जब तक ये सुधार लागू नहीं होते, तब तक हर सफर किसी खतरे से कम नहीं होगा।

“सवाल साफ है-क्या हम यात्रियों की जान को लॉटरी की तरह छोड़ देंगे या फिर अब भी समय रहते व्यवस्था को सुरक्षित बनाएंगे…?”

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