February 6, 2026

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सेना से भगोड़ा जवान और सिस्टम की चूक

रक्सौल
  • संवेदनशील संस्थानों से जुड़े लोगों का गलत राह पर जाना गंभीर संकेत। रक्सौल जैसे सीमावर्ती क्षेत्र फिर बने आसान रास्ते। निगरानी और समन्वय को मजबूत करने की जरूरत उजागर हुई

Khabari Chiraiya Desk: बिहार के पूर्वी चंपारण के रक्सौल बॉर्डर से एक सेना के भगोड़े जवान की गिरफ्तारी केवल एक पुलिस कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह देश की आंतरिक सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता पैदा करने वाली घटना है। जिस तरह से नशा तस्करी, हथियार और सीमा पार संपर्क एक ही व्यक्ति में जुड़े मिले हैं, वह बताता है कि खतरा अब सिर्फ सीमा के बाहर से नहीं, भीतर से भी उभर रहा है। यह मामला साबित करता है कि आतंक और नशे का गठजोड़ कितना खतरनाक रूप ले चुका है।

सेना जैसी अनुशासित संस्था से जुड़ा व्यक्ति जब देश विरोधी गतिविधियों में शामिल पाया जाता है, तो यह केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं रह जाता। यह उस व्यवस्था के लिए भी चेतावनी है, जहां संवेदनशील जानकारी, प्रशिक्षण और संसाधनों तक पहुंच रखने वाले लोग गलत हाथों में इस्तेमाल होने लगते हैं। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर ऐसे लोग किन हालातों में कट्टरपंथ और अपराध के रास्ते पर पहुंच रहे हैं।

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रक्सौल जैसे सीमावर्ती क्षेत्र का इस्तेमाल भागने के रास्ते और तस्करी के केंद्र के रूप में होना नई बात नहीं है। नेपाल सीमा की खुली भौगोलिक स्थिति लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती रही है। लेकिन जब इसी रास्ते से आतंक और नशे का नेटवर्क संचालित होने लगे, तब यह खतरा कई गुना बढ़ जाता है। यह घटना बताती है कि सीमाओं की निगरानी अब सिर्फ भौतिक सुरक्षा तक सीमित नहीं रह सकती।

नशा तस्करी और आतंकवाद का रिश्ता कोई संयोग नहीं है। नशे से मिलने वाला पैसा आतंक की रीढ़ बनता है और आतंक नशे के कारोबार को सुरक्षा देता है। इस गिरफ्तारी में हेरोइन और विस्फोटक का एक साथ मिलना इसी सच्चाई को उजागर करता है। यह साफ संकेत है कि यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि संगठित नेटवर्क का हिस्सा है, जिसकी जड़ें देश के भीतर और बाहर दोनों तरफ फैली हो सकती हैं।

पाकिस्तान स्थित हैंडलरों से संपर्क की बात सामने आना इस मामले को और गंभीर बनाता है। यह दिखाता है कि दुश्मन देश केवल सीमा पार से हमला करने की रणनीति नहीं अपनाते, बल्कि वे भीतर से व्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश भी करते हैं। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि जांच केवल गिरफ्तार व्यक्ति तक सीमित न रहे, बल्कि पूरे नेटवर्क की परतें खोली जाएं।
यह गिरफ्तारी सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक सफलता जरूर है, लेकिन साथ ही यह आत्ममंथन का अवसर भी है। सेना, पुलिस और खुफिया तंत्र के बीच समन्वय को और मजबूत करने की जरूरत है। संवेदनशील संस्थानों में कार्यरत लोगों की नियमित निगरानी, मानसिक स्थिति और सामाजिक परिस्थितियों पर भी ध्यान देना अब समय की मांग बन गया है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हम ऐसी घटनाओं को सिर्फ खबर बनाकर भूल जाएंगे या इससे सीख लेकर ठोस नीतिगत बदलाव करेंगे। रक्सौल से पकड़ा गया यह भगोड़ा जवान हमें याद दिलाता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सीमाओं पर तैनात सैनिकों से नहीं, बल्कि पूरे समाज की सतर्कता से मजबूत होती है। आतंक और नशे के इस गठजोड़ को जड़ से खत्म करना ही अब देशहित में सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।

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