खत्म हुई रूस-अमेरिका की आखिरी बाध्यकारी परमाणु संधि
- न्यू स्टार्ट की विदाई से खुला परमाणु संतुलन का नया और खतरनाक अध्याय, अब दोनों महाशक्तियां बिना कानूनी पाबंदी के रणनीतिक हथियार बढ़ाने को स्वतंत्र
Khabari Chiraiya Desk: गुरुवार 5 फरवरी 2026 की तारीख वैश्विक सुरक्षा इतिहास में एक अहम मोड़ के रूप में दर्ज हो गई है। रूस और अमेरिका के बीच रणनीतिक परमाणु हथियारों को सीमित करने वाली न्यू स्टार्ट संधि की अवधि आज समाप्त हो गई। इसके साथ ही लगभग पांच दशक से चली आ रही परमाणु हथियार नियंत्रण व्यवस्था का अंतिम मजबूत ढांचा भी ढह गया। अब पहली बार दुनिया की दो सबसे बड़ी परमाणु शक्तियां बिना किसी बाध्यकारी कानूनी सीमा के अपने रणनीतिक हथियारों का विस्तार कर सकती हैं।
न्यू स्टार्ट समझौता 8 अप्रैल 2010 को चेक गणराज्य की राजधानी प्राग में हस्ताक्षरित हुआ था। इसे 5 फरवरी 2011 से लागू किया गया। उस समय इसे परमाणु होड़ को नियंत्रित करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया गया था। इस संधि के तहत दोनों देशों को अपने तैनात रणनीतिक परमाणु वारहेड्स की संख्या अधिकतम 1550 तक सीमित रखनी थी। इसके साथ 700 तैनात लॉन्चर और 800 कुल लॉन्चिंग प्रणालियों की भी सीमा तय की गई थी।

इस समझौते की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता केवल संख्यात्मक कटौती नहीं थी, बल्कि कठोर निरीक्षण और पारदर्शिता तंत्र भी था। दोनों देश एक दूसरे के परमाणु ठिकानों का निरीक्षण कर सकते थे और नियमित रूप से डेटा का आदान-प्रदान अनिवार्य था। इससे विश्वास बहाली की प्रक्रिया को मजबूती मिलती थी।
परमाणु हथियारों पर नियंत्रण की कोशिशें शीत युद्ध काल से जारी रही हैं। 1970 के दशक में SALT समझौतों ने संख्या सीमित करने का प्रयास किया, 1991 में START I के जरिए बड़े पैमाने पर कटौती हुई और 2002 के मॉस्को समझौते ने वारहेड्स कम करने पर सहमति बनाई। न्यू स्टार्ट इन्हीं प्रयासों की निरंतरता में सबसे प्रभावी और पारदर्शी व्यवस्था माना गया।
2021 में इसे पांच वर्ष के लिए बढ़ाया गया था, लेकिन 2023 में रूस ने निरीक्षण प्रक्रिया स्थगित कर दी। यूक्रेन युद्ध और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच विश्वास का संकट गहराता गया। हालांकि रूस ने सीमाओं के पालन का दावा जारी रखा, लेकिन सक्रिय निगरानी बंद हो गई। अंततः आज इसकी अवधि समाप्त हो गई और अब दोनों देश औपचारिक रूप से इस संधि के दायित्वों से मुक्त हो चुके हैं।
जनवरी 2025 के अनुमानों के अनुसार रूस के पास लगभग 4309 और अमेरिका के पास करीब 3700 परमाणु वारहेड्स हैं। दोनों देश मिलकर वैश्विक परमाणु भंडार का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा नियंत्रित करते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोई नया समझौता जल्द नहीं हुआ तो हथियारों की नई प्रतिस्पर्धा शुरू हो सकती है। कुछ विश्लेषकों के अनुसार चरम स्थिति में दोनों देश अपनी तैनात क्षमताओं को लगभग दोगुना करने की तकनीकी क्षमता रखते हैं, हालांकि इसमें समय और भारी संसाधनों की आवश्यकता होगी।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने इसे अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए गंभीर क्षण बताया है। अब दुनिया की नजर इस बात पर है कि क्या नई कूटनीतिक पहल शुरू होगी या वैश्विक रणनीतिक संतुलन एक अधिक अस्थिर और जोखिमपूर्ण युग में प्रवेश करेगा। परमाणु संतुलन का यह नया दौर केवल दो देशों का मामला नहीं है, बल्कि पूरी मानवता की सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न बन चुका है।
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