February 5, 2026

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यूपी : बाराबंकी में आवारा कुत्तों का आतंक और हमारी सोती व्यवस्था

  • बाराबंकी की घटना केवल हादसा नहीं, प्रशासनिक लापरवाही का आईना, दो घंटे में 11 लोग घायल

Khabari Chiraiya Desk: यूपी के बाराबंकी जिले के हैदरगढ़ क्षेत्र में एक पागल कुत्ते द्वारा दो घंटे के भीतर 11 लोगों को काटे जाने की घटना केवल एक स्थानीय खबर नहीं है, बल्कि यह हमारे प्रशासनिक तंत्र और शहरी प्रबंधन की कमजोरियों को उजागर करने वाली चेतावनी है। जब एक जानवर खुलेआम बाजार, चौराहे, रेलवे क्रॉसिंग और गलियों में आतंक मचाता रहे और लोग लाठी लेकर अपनी जान बचाने को मजबूर हों तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर जिम्मेदारी किसकी है।

बताया गया कि शाम चार बजे से छह बजे के बीच कुत्ता रास्ते में जो भी मिला उसे काटता गया। बाइक सवार युवक से लेकर सड़क पार कर रहे लोग, दुकान जा रहे बुजुर्ग और यहां तक कि एक मासूम बच्ची तक उसकी चपेट में आ गई। बच्ची के गाल पर गंभीर घाव हुआ और उसे जिला अस्पताल रेफर करना पड़ा। यह दृश्य किसी फिल्मी कहानी जैसा नहीं, बल्कि हमारे कस्बों की सच्चाई है।

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Panchayat Voice

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि ऐसी घटनाएं अचानक नहीं होतीं। आवारा और बीमार कुत्तों की बढ़ती संख्या लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। नगर पंचायत और स्थानीय प्रशासन के पास पशु पकड़ने, टीकाकरण और नसबंदी कार्यक्रम चलाने की जिम्मेदारी होती है, लेकिन अधिकतर स्थानों पर यह काम कागजों तक सीमित रहता है। परिणाम यह होता है कि जब कोई गंभीर घटना घटती है तब ही हड़बड़ी में कार्रवाई की बात की जाती है।

इस घटना के बाद ग्रामीणों ने बीडीओ और नगर पंचायत अध्यक्ष को सूचना देकर कुत्तों से निजात दिलाने की मांग की। लेकिन क्या यह पहली बार है जब लोगों ने ऐसी शिकायत की हो। शायद नहीं। समस्या यह है कि जब तक मामला सुर्खियों में नहीं आता, तब तक व्यवस्थाएं सक्रिय नहीं होतीं।

स्वास्थ्य व्यवस्था की भूमिका भी अहम है। सीएचसी में दो घंटे के भीतर 11 घायलों का पहुंचना इस बात का संकेत है कि खतरा कितना बड़ा था। डॉक्टरों ने सभी को एंटी रैबीज इंजेक्शन लगाया, जो सराहनीय है। लेकिन रैबीज जैसी घातक बीमारी के जोखिम को देखते हुए केवल उपचार पर्याप्त नहीं है। रोकथाम ही असली समाधान है।

आवारा कुत्तों की समस्या को लेकर अक्सर दो पक्ष सामने आते हैं। एक ओर पशु अधिकारों की बात होती है, दूसरी ओर नागरिकों की सुरक्षा का प्रश्न। दोनों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। वैज्ञानिक तरीके से नसबंदी, टीकाकरण और नियंत्रित पुनर्वास कार्यक्रम लागू किए जा सकते हैं। लेकिन इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक प्रतिबद्धता चाहिए।

हैदरगढ़ की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में और भी गंभीर घटनाएं हो सकती हैं। बच्चों, बुजुर्गों और आम नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि है। नगर निकायों को सक्रिय निगरानी तंत्र बनाना होगा, हेल्पलाइन और त्वरित प्रतिक्रिया दल तैयार करने होंगे और नियमित सर्वे के जरिए जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करनी होगी।

यह केवल एक पागल कुत्ते का मामला नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है जो चेतावनी मिलने के बाद भी जागने में देर कर देती है। अब समय है कि स्थानीय प्रशासन कागजी योजनाओं से आगे बढ़कर जमीनी कार्रवाई करे, ताकि लोगों को अपनी ही गलियों में डरकर न चलना पड़े।

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