कानून के सामने सब बराबर, पुराने मुकदमे में सांसद की गिरफ्तारी
Khabari Chiraiya Desk : पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव की गिरफ्तारी ने एक बार फिर यह प्रश्न सामने ला खड़ा किया है कि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय व्यक्तियों के लिए कानून के दायरे की सीमाएं क्या हैं और न्यायिक प्रक्रिया के प्रति उनकी जवाबदेही कितनी अनिवार्य है। यह मामला कोई नया नहीं, बल्कि तीन दशक पुराना है। किंतु जब कोई जनप्रतिनिधि अदालत में निर्धारित तिथि पर उपस्थित नहीं होता तो न्याय व्यवस्था अपनी प्रक्रिया के अनुरूप कदम उठाती है। यही इस प्रकरण का मूल बिंदु है।
पुलिस के अनुसार यह मामला 1995 में दर्ज हुआ था और अब भारतीय न्याय संहिता के प्रावधानों के अंतर्गत विचाराधीन है। अदालत में सुनवाई जारी थी और सांसद को उपस्थित होना था। अनुपस्थित रहने पर गिरफ्तारी की कार्रवाई की गई। विधि का सिद्धांत स्पष्ट है कि चाहे व्यक्ति कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, न्यायालय के आदेश की अवहेलना के परिणाम होते हैं। यह सिद्धांत लोकतंत्र की बुनियाद है।

हालांकि गिरफ्तारी के बाद पप्पू यादव ने अपनी सेहत और सुरक्षा को लेकर चिंता जताई और आशंका व्यक्त की कि उनके साथ अनिष्ट हो सकता है। यह बयान राजनीतिक विमर्श को भावनात्मक आयाम देता है। किसी भी जनप्रतिनिधि को अपनी सुरक्षा को लेकर आशंका हो सकती है, किंतु ऐसी स्थिति में भी समाधान न्यायिक प्रक्रिया के भीतर ही तलाशा जाना चाहिए। अदालतों का दरवाजा ही अंतिम और सर्वोच्च विकल्प होता है, न कि सार्वजनिक आरोप-प्रत्यारोप।
यह भी महत्वपूर्ण है कि पुलिस ने मेडिकल जांच और आवश्यक दवाओं की उपलब्धता का उल्लेख किया है। इसका अर्थ है कि प्रक्रिया को औपचारिक और विधिसम्मत बनाए रखने का प्रयास किया गया। फिर भी, इस घटना ने यह संकेत दिया है कि पुराने मामलों का लंबित रहना और समय पर निष्पादन न होना राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर जटिल परिस्थितियां पैदा कर सकता है। यदि मुकदमे समयबद्ध ढंग से निपटाए जाएं तो ऐसी स्थितियों से बचा जा सकता है।
इस प्रकरण का दूसरा पहलू राजनीतिक नैरेटिव से जुड़ा है। जनप्रतिनिधि अक्सर अपने खिलाफ कार्रवाई को राजनीतिक प्रतिशोध के रूप में प्रस्तुत करते हैं। दूसरी ओर, प्रशासन इसे न्यायिक आदेश का पालन बताता है। सत्य इन दोनों के बीच कहीं न कहीं न्यायालय के अभिलेखों में निहित होता है। इसलिए सार्वजनिक विमर्श में संयम और तथ्यों पर आधारित चर्चा आवश्यक है।
लोकतंत्र में सबसे बड़ा संदेश यही है कि कानून सबके लिए समान है। सांसद हो या सामान्य नागरिक, न्यायिक आदेश का पालन करना अनिवार्य है। यदि कोई असहमति है, तो उसका समाधान भी न्यायिक व्यवस्था के भीतर ही खोजा जाना चाहिए। यह घटना हमें याद दिलाती है कि राजनीति से ऊपर संविधान और कानून की सर्वोच्चता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती इसी सिद्धांत पर टिकी हुई है।
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