दिल्ली की दीवारों पर फिर खिला बज्जी रंग
- ग्रेटर कैलाश की गैलरी में लोक स्मृतियों ने ली सांस, मुजफ्फरपुर की बेटियों ने रची सांस्कृतिक पुनर्जागरण की कथा
Khabari Chiraiya Desk : राजधानी में जब ग्रेटर कैलाश स्थित चंपा आर्ट गैलरी के प्रांगण में रंगों की आभा बिखर रही थी, तब वहां केवल चित्रों की प्रदर्शनी नहीं लगी थी, बल्कि इतिहास अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों के साथ उपस्थित था। एमओएसए के तत्वावधान में आयोजित इस प्रदर्शनी में मुजफ्फरपुर की बेटियां कंचन प्रकाश और संजू देवी ने अपनी बज्जी पेंटिंग के माध्यम से एक प्राचीन परंपरा को आधुनिक मंच पर जीवंत कर दिया।
डब्ल्यू 114 ग्रेटर कैलाश स्थित गैलरी में सजी इन कलाकृतियों के उद्घाटन के लिए भारत में बेल्जियम के राजदूत एच ई डीडीअर भेंडर हसेल्ट मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने चित्रों को गहराई से देखा और उनकी मौलिकता तथा सांस्कृतिक संवेदना की खुलकर प्रशंसा की। रंगों और आकृतियों में छिपी लोक आत्मा ने उन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया।

इस अवसर पर बज्जिका इतिहासकार के रूप में आमंत्रित साहित्य मार्तण्ड उदय नारायण सिंह ने अपने विचार रखते हुए वृज्जीसंघ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि लगभग तीन सौ से सात सौ वर्ष पूर्व भारत के सोलह महाजनपदों में एक महाजनपद वृज्जीसंघ था, जिसकी भौगोलिक सीमा गंगा के उत्तर से लेकर सदानीरा गंडकी, कोशी और हिमालय तक फैली थी। इसी क्षेत्र की बोली बज्जिका रही और उसी की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के रूप में बज्जी पेंटिंग विकसित हुई।
उन्होंने कहा कि समय के साथ यह कला लगभग विलुप्ति की ओर बढ़ चली थी, किंतु कंचन प्रकाश और संजू देवी ने इसे पुनर्जीवित कर नई पहचान दी है। उनकी कृतियों में लोकजीवन, प्रकृति और सांस्कृतिक स्मृतियों का संगम दिखाई देता है, जो न केवल बिहार बल्कि पूरे देश की विरासत का प्रतिनिधित्व करता है।
प्रदर्शनी ने यह संदेश दिया कि क्षेत्रीय कला केवल सीमित भूभाग की पहचान नहीं होती, वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी जगह बना सकती है। ग्रेटर कैलाश की इस सांस्कृतिक संध्या में बज्जी कला ने यह सिद्ध कर दिया कि परंपरा जब समर्पण और साधना से जुड़ती है तो वह समय की सीमाओं को लांघकर नए क्षितिज रचती है।
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