February 13, 2026

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सैलरी आपकी लेकिन पहला हक बैंक का

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महीने की शुरुआत खुशी से नहीं कटौती से होती है।क्रेडिट और ईएमआई ने खर्च की आदत बदल दी

Khabari Chiraiya Desk: देश का मध्यम वर्ग एक ऐसे आर्थिक दौर से गुजर रहा है, जहां सैलरी आने का दिन खुशी से ज्यादा चिंता लेकर आता है। महीने की पहली तारीख को खाते में वेतन आते ही मोबाइल पर मैसेज चमकता है, लेकिन कुछ ही घंटों में ईएमआई, क्रेडिट कार्ड बिल और लोन की कटौतियां उस खुशी को फीका कर देती हैं। सवाल यह है कि क्या हम सुविधा खरीद रहे हैं या किस्तों में बंधी हुई जिंदगी जी रहे हैं?

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बीते कुछ वर्षों में बैंकों और वित्तीय कंपनियों ने कर्ज को इतना आसान बना दिया है कि अब लोन लेना लगभग एक क्लिक का खेल हो गया है। प्री-अप्रूव्ड लोन, नो कॉस्ट ईएमआई, इंस्टेंट अप्रूवल जैसे शब्द आम उपभोक्ता को आकर्षित करते हैं। निजी बैंक फोन कॉल, मैसेज और ईमेल के जरिए लगातार ऑफर भेजते हैं। पांच मिनट में पैसा खाते में पहुंचाने का दावा किया जाता है। कागज कम, प्रक्रिया आसान और भुगतान किस्तों में। सुनने में सब कुछ सुविधाजनक लगता है।
लेकिन इस सुविधा के पीछे की सच्चाई उतनी सरल नहीं है। विशेषज्ञ बताते हैं कि ईएमआई की सबसे बड़ी चाल उसकी छोटी राशि होती है। 1500, 3000 या suggestively कम दिखने वाली किस्तें अलग-अलग लेने पर मामूली लगती हैं, लेकिन जब एक साथ कई ईएमआई जुड़ जाती हैं तो आय का बड़ा हिस्सा हर महीने कटने लगता है। नतीजा यह कि खर्च करने की स्वतंत्रता सीमित हो जाती है और भविष्य की बचत प्रभावित होती है।

आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत में शहरी मध्यम वर्ग तेजी से उपभोग आधारित जीवनशैली की ओर बढ़ा है। महंगे मोबाइल फोन, बाइक, एलईडी टीवी, लैपटॉप और घरेलू उपकरण अब किस्तों पर आसानी से उपलब्ध हैं। विक्रेताओं और बैंकों के बीच समझौते भी इस प्रक्रिया को बढ़ावा देते हैं। ग्राहक को बताया जाता है कि ईएमआई में खरीदना लाभकारी है, जबकि कई मामलों में प्रोसेसिंग फीस, जीएसटी और ब्याज का बोझ वास्तविक कीमत को बढ़ा देता है।

एक उदाहरण पर नजर डालें। यदि कोई उपभोक्ता 50 हजार रुपये का सामान 12 महीने की ईएमआई पर लेता है, तो शुरुआत में प्रोसेसिंग फीस काटी जाती है। उसके बाद हर महीने निश्चित राशि खाते से डेबिट होती रहती है। छह महीने बाद भी मूलधन का बड़ा हिस्सा बाकी रह सकता है। यदि उपभोक्ता बीच में लोन बंद करना चाहे तो प्रीक्लोजर चार्ज अलग से देना पड़ता है। यानी कर्ज से जल्दी बाहर निकलना भी आसान नहीं होता।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार ईएमआई का दबाव केवल आर्थिक नहीं, मानसिक भी होता है। हर महीने की तय तारीख, लेट पेमेंट का डर, सिबिल स्कोर खराब होने की चिंता और बैंक के रिमाइंडर कॉल तनाव को बढ़ाते हैं। कई लोग नौकरी बदलने या जोखिम लेने से बचते हैं क्योंकि उन्हें हर महीने तय राशि चुकानी होती है। इस तरह ईएमआई धीरे-धीरे स्वतंत्रता को सीमित कर देती है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि हर लोन गलत नहीं होता। शिक्षा, इलाज या घर खरीदने जैसे आवश्यक उद्देश्यों के लिए कर्ज लेना कई बार व्यावहारिक समाधान होता है। समस्या तब पैदा होती है जब कर्ज दिखावे या तात्कालिक सुख के लिए लिया जाए। आय अनिश्चित हो और खर्च स्थायी किस्त में बदल जाए, तो असंतुलन निश्चित है।

वित्तीय सलाहकारों की राय है कि किसी भी ईएमआई से पहले कुल लागत का आकलन करना जरूरी है। केवल मासिक किस्त नहीं, बल्कि कुल भुगतान, ब्याज दर, प्रोसेसिंग फीस और अन्य शुल्क समझना चाहिए। साथ ही यह भी देखना चाहिए कि कुल ईएमआई आपकी मासिक आय के कितने प्रतिशत से अधिक न हो।
स्पष्ट है कि आसान कर्ज की संस्कृति ने उपभोग को बढ़ावा दिया है, लेकिन इसके साथ जोखिम भी बढ़े हैं। सैलरी का बड़ा हिस्सा यदि किस्तों में बंध जाए तो बचत, निवेश और भविष्य की योजनाएं प्रभावित होती हैं।

अंततः सवाल यह नहीं है कि ईएमआई सही है या गलत। असली प्रश्न यह है कि क्या हम समझदारी से निर्णय ले रहे हैं। सपने देखना गलत नहीं, लेकिन उन सपनों की कीमत यदि भविष्य की सुरक्षा हो, तो सोचने की जरूरत है। समय रहते वित्तीय अनुशासन और संतुलन ही इस जाल से बचने का रास्ता है।

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