रूस से तेल सौदे पर बदला समीकरण
- अमेरिका की सख्त व्यापार नीति और रूसी कच्चे तेल की खरीद पर लगाए गए अतिरिक्त शुल्क ने भारत-रूस ऊर्जा कारोबार की दिशा बदल दी है
Khabari Chiraiya Desk : रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा जरूरतों को संतुलित करने की भारत की रणनीति अब अमेरिकी टैरिफ दबाव के कारण नई चुनौतियों का सामना कर रही है। व्यापार आंकड़ों के अनुसार जनवरी में रूस से भारत का कुल मर्चेंडाइज आयात उल्लेखनीय रूप से घट गया है। यह गिरावट मुख्य रूप से भारतीय रिफाइनरियों द्वारा रूसी कच्चे तेल की खरीद में की गई कटौती का परिणाम मानी जा रही है।
आधिकारिक आंकड़े दर्शाते हैं कि पिछले वर्ष जनवरी की तुलना में इस बार रूस से आयातित वस्तुओं का कुल मूल्य काफी कम हो गया। जहां पहले यह आंकड़ा लगभग 4.8 बिलियन डॉलर के आसपास था, वहीं अब यह घटकर करीब 2.9 बिलियन डॉलर के स्तर पर आ गया है। यानी आयात में लगभग 40 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।

विशेषज्ञों का कहना है कि रूस से होने वाले कुल आयात में कच्चे तेल की हिस्सेदारी करीब 80 प्रतिशत तक रहती है। ऐसे में तेल खरीद में कमी का सीधा असर कुल व्यापारिक आंकड़ों पर दिखाई देना स्वाभाविक है। भारत रूस से तेल के अलावा कोयला, कोक, उर्वरक, लौह उत्पाद, अखबारी कागज, परियोजना उपकरण, दालें तथा कीमती और अर्ध-कीमती पत्थर भी आयात करता है, लेकिन इनमें से कोई भी वस्तु कच्चे तेल जितनी बड़ी मात्रा में नहीं आती।
अमेरिका की ओर से लगाए गए अतिरिक्त टैरिफ ने इस परिदृश्य को और जटिल बना दिया। अप्रैल 2025 में जब अमेरिकी प्रशासन ने तथाकथित लिबरेशन डे टैरिफ की घोषणा की, उसी अवधि में भारत ने रूस से बड़ी मात्रा में तेल आयात किया था। इसके बाद अमेरिका ने पहले 25 प्रतिशत और फिर रूस से तेल खरीद जारी रखने पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क लगाकर भारतीय उत्पादों पर कुल 50 प्रतिशत टैरिफ का दबाव बना दिया।
इस सख्त रुख का असर धीरे-धीरे भारतीय ऊर्जा कंपनियों के फैसलों में दिखाई देने लगा। सितंबर तक रूसी कच्चे तेल के आयात में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि रिफाइनरियां जोखिम और लागत दोनों को संतुलित करने की कोशिश में आपूर्ति स्रोतों में विविधता ला रही हैं।
इसी संदर्भ में देश की प्रमुख निजी रिफाइनरी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने भी संकेत दिया कि उसे जनवरी में रूसी कच्चे तेल की डिलीवरी की उम्मीद नहीं है। इससे यह स्पष्ट होता है कि ऊर्जा कारोबार केवल कीमतों पर नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक समीकरणों पर भी निर्भर हो चुका है।
हालांकि हाल ही में एक अंतरिम समझौते के तहत अमेरिका ने कुछ टैरिफ में राहत दी है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक ऊर्जा व्यापार अब पहले जैसा सरल नहीं रहेगा। भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा, किफायती आयात और वैश्विक कूटनीतिक संतुलन के बीच संतुलन कैसे बनाए रखे।
रूस से तेल खरीद में आई यह कमी केवल व्यापारिक आंकड़ा नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक आर्थिक समीकरणों की एक अहम झलक है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत अपनी ऊर्जा रणनीति को किस दिशा में ले जाता है।
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