बिहार: क्या शाहजहां कैद में हैं, औरंगज़ेब का राज चल रहा है
- बिहार में रोज नई बयार चल रही है, क्या टूटेगा जनता दल यूनाइटेड।
Khabari Chiraiya Desk: भारतीय जनता पार्टी के कैंप में अब तक अकबर-बाबर, हिंदू-मुस्लिम, मुजरा जैसी चर्चाएं होती रही हैं, लेकिन पहली बार जनता दल यूनाइटेड के भीतर शाहजहां और औरंगज़ेब की चर्चा सुनाई दे रही है। यह नाम भले ऐतिहासिक लगें, लेकिन इनका राजनीतिक अर्थ गहरा है। कहा जा रहा है कि बिहार में आज शाहजहां कैद में हैं और औरंगज़ेब का शासन चल रहा है। मुख्यमंत्री को अपने ही लोगों से मिलने की आज़ादी नहीं है।
सच तो यह है कि नीतीश कुमार पहले भी लालू प्रसाद यादव की तरह जनता के बीच सहज रूप से उपलब्ध नहीं थे, लेकिन उनसे मिलना असंभव भी नहीं था। प्रयास करने पर भेंट हो जाती थी। उन्होंने जनता से संवाद के लिए कई राजनीतिक यात्राएं शुरू कीं, जिनका उद्देश्य जन-संपर्क और संवाद था। पर धीरे-धीरे ये यात्राएं प्रशासनिक औपचारिकता बन गईं और ‘जीविका दीदी रैली’ जैसे आयोजनों में सिमट गईं।

मुख्यमंत्री बनने के शुरुआती वर्षों में नीतीश कुमार अपने सहयोगियों और जनता से सीधे संवाद करते थे। फ़ोन पर बात कर लेते थे, मुलाकात तय हो जाती थी और यह रिश्ता उन्हें जनता से जोड़े रखता था। जब तक यह सिस्टम चला, तब तक औरंगज़ेब यानी सत्ताधारी सलाहकार या अधिकारी सीमित प्रभाव में थे।
2005 से 2010 के बीच जनता दल यूनाइटेड एक सधे हुए संगठन के रूप में उभरा। उस दौर में पार्टी में 95 प्रतिशत सदस्य ‘ओरिजिनल प्रोडक्ट’ कहे जाते थे-यानी समता पार्टी की विरासत से जुड़े पुराने लोग। लेकिन 2010 के विधानसभा चुनाव के बाद हालात बदलने लगे।
जब जॉर्ज फर्नांडिस को किनारे कर शरद यादव ने पार्टी की कमान संभाली तो राजनीतिक भर्ती के सारे दरवाज़े खोल दिए गए। उसी समय से समता पार्टी के पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं को दरकिनार करने का दौर शुरू हुआ।
जिस कांग्रेस और समाजवादी विचारधारा से लड़कर समता पार्टी बनी थी, उन्हीं विचारों के लोग अब जनता दल यूनाइटेड में शामिल होने लगे। कुछ लोग कांग्रेस से आए, कुछ समाजवादी धारा से। नतीजा यह हुआ कि पार्टी का मूल चरित्र कमजोर पड़ने लगा और संगठन एक “मिक्स अचार” बन गया।
फिर भी 2010 का चुनाव नीतीश कुमार के लिए सुनहरा साबित हुआ। एनडीए को बड़ी जीत मिली-जदयू 114 सीटों पर और भाजपा 92 सीटों पर पहुंची। पर, यही प्रचंड बहुमत आगे चलकर उनके लिए चिंता का कारण बना। भाजपा की बढ़ती ताकत और लोकप्रियता ने पहली बार नीतीश कुमार को असहज किया।
2013 में भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाया। इससे पहले ही महाराजगंज उपचुनाव में भाजपा और जदयू के रास्ते अलग हो चुके थे। इस बीच, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को कमजोर करने की साजिशें धीरे-धीरे आकार लेने लगीं। कुछ अधिकारियों और पत्रकारों ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का सपना दिखाया। इस ‘मति भ्रम’ की पटकथा में कुछ नेता और एक विशेष वर्ग भी शामिल था।
बिना ठोस तैयारी और राजनीतिक मूल्यांकन के नीतीश कुमार ने भाजपा से अलग होने का फ़ैसला लिया। उस समय उन्होंने ‘नीति और सिद्धांत’ की बात की थी, लेकिन जल्द ही वही सिद्धांत दबावों और परिस्थितियों के बीच खो गए।
2014 के लोकसभा चुनाव में जनता दल यूनाइटेड का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। पार्टी को केवल दो सीटें मिलीं। मोदी लहर में पूरा बिहार बह गया। इससे आहत नीतीश कुमार ने जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी।
लेकिन जब उन्हें एहसास हुआ कि सरकार की बागडोर कमजोर हाथों में चली गई है और उनके खिलाफ स्लीपर सेल सक्रिय है, तो उन्होंने दोबारा सत्ता संभाली। शरद यादव की पहल से पार्टी और सरकार दोनों बच गईं, लेकिन नीतीश पर ‘पलटू राम’ का ठप्पा लग गया।
2015 में उन्होंने लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन बनाया और चुनाव लड़ा। इस गठबंधन की सफलता ने बिहार की राजनीति को नया मोड़ दिया। नीतीश कुमार दोबारा मुख्यमंत्री बने और देशभर में ‘विकास पुरुष’ के रूप में चर्चा में आए।
लेकिन इस चुनाव में जनता दल यूनाइटेड को एक झटका भी लगा। राजद ने 22 से छलांग लगाकर 80 सीटें हासिल कीं और सबसे बड़ी पार्टी बन गई। जदयू 72 सीटों पर सिमट गया। कई जगह राजद समर्थकों ने गठबंधन प्रत्याशियों को पूरी ताकत से समर्थन नहीं दिया, जिससे आपसी अविश्वास पनपा। मतभेद के बावजूद लालू ने समझदारी दिखाई और नीतीश को मुख्यमंत्री बनाए रखा।
महागठबंधन की सरकार देशभर में चर्चा का विषय बनी। इसे ‘राजनीतिक प्रयोग’ कहा गया, पर जल्द ही इस प्रयोग में दरारें उभरने लगीं। जदयू के भीतर कुछ खास समाज और प्रशासनिक हलकों के लोग भाजपा के प्रति झुकाव रखने लगे।
उधर, राजद अपने चरित्र के अनुरूप सक्रिय हुआ-दबाव की राजनीति, नियुक्तियों में दखल और प्रशासनिक खींचतान। इससे नीतीश कुमार एक बार फिर असहज हुए।
इसी दौरान अपने पुराने मित्र अरुण जेटली की मदद से उन्होंने भाजपा की ओर वापसी का रास्ता बनाया। अरुण जेटली ने उन्हें राजनीतिक आश्वासन दिया और अपने करीबी संजय झा को नीतीश के पास भेजा। दुर्भाग्य से जेटली का निधन हो गया, लेकिन संजय झा का प्रभाव बढ़ता गया।
आज संजय झा मुख्यमंत्री के बेहद करीबी और प्रभावशाली व्यक्ति माने जाते हैं। सीएम हाउस में धार्मिक अनुष्ठानों से लेकर नियुक्तियों तक सब कुछ उन्हीं की जानकारी में होता है। इसी वजह से अब उन्हें ‘औरंगज़ेब’ कहा जाने लगा है।
चर्चा है कि शाहजहां यानी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कैद में हैं। उनसे मिलने के रास्ते सीमित कर दिए गए हैं। अंदरखाने से खबरें लीक हो रही हैं कि एक ‘सिपाही’ नामक व्यक्ति पूरी व्यवस्था नियंत्रित कर रहा है।
कहा जा रहा है कि यह सिपाही अब भी राज प्रसाद का मोह नहीं छोड़ पा रहा। वफादारी का भ्रम फैलाकर उसने मुख्यमंत्री के चारों ओर स्लीपर सेल की घेराबंदी कर रखी है। हवाई चप्पल पहनने वाला यह व्यक्ति अब सत्ता के गलियारों में संपन्नता का प्रतीक बन गया है। वह खुद को अब भी पार्टी का झंडा ढोने वाला पुराना कार्यकर्ता बताता है, जबकि हकीकत यह है कि आज वही लोगों के मिलने-जुलने पर पहरा दे रहा है।
अब हालत यह है कि मुख्यमंत्री से मुलाकात का रास्ता उसी ‘सिपाही जी’ के ज़रिए निकलता है और उसके लिए ऊंची रकम की चर्चा रहती है।
सरकारी अधिकारी हों या पार्टी पदाधिकारी-सबको महसूस हो रहा है कि मुख्यमंत्री अपने ही सिस्टम में कैद हैं।
आरसीपी सिंह के दौर में यह घेराबंदी शुरू हुई थी। उन्होंने समता पार्टी के पुराने साथियों की स्क्रीनिंग शुरू की थी ताकि केवल ‘वफादार’ लोग आगे बढ़ें और विरोधियों को किनारे किया जा सके। वही परंपरा अब तक चली आ रही है।
आरसीपी सिंह अब भले पार्टी से अलग हों, लेकिन उनके ‘जवान’ आज भी स्लीपर सेल के तौर पर सक्रिय बताए जा रहे हैं।
ऐसे में बिहार की राजनीति में यह सवाल बार-बार उठ रहा है-क्या शाहजहां वाकई कैद में हैं? क्या मुख्यमंत्री के चारों ओर स्लीपर सेल का यह जाल अब भी कायम है? क्या वह कभी इस घेरे से बाहर निकल पाएंगे?
आने वाले चुनाव के बाद ही यह तय होगा कि नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक कैद से आज़ाद होंगे या फिर औरंगज़ेब का यह शासन यूं ही चलता रहेगा।
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