February 7, 2026

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आंध्रप्रदेश : राष्ट्रपति ने सत्य साई बाबा के आदर्शों को बताया राष्ट्र विकास का मार्गदर्शक

  • पुट्टपर्थी के सत्र में उन्होंने कहा कि सेवा और प्रेम पर आधारित जीवन हर नागरिक को दिशा देता है

Khabari Chiraiya Desk: आंध्रप्रदेश के पुट्टपर्थी के प्रशांति निलयम में शनिवार का दिन आध्यात्मिक ऊर्जा और मानवीय मूल्यों की नई अनुभूति का क्षण बन गया, जब भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने श्री सत्य साई बाबा के शताब्दी समारोह के उपलक्ष्य में आयोजित विशेष सत्र में भाग लेकर देश को सेवा, प्रेम और करुणा के सार्वभौमिक संदेश की याद दिलाई। विशाल जनसमूह के बीच राष्ट्रपति का संबोधन न केवल बाबा के जीवन दर्शन का सम्मान था, बल्कि राष्ट्र निर्माण में आध्यात्मिक संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका पर भी स्पष्ट दृष्टि प्रस्तुत करता है।

राष्ट्रपति मुर्मु ने अपने संबोधन में कहा कि भारत की आध्यात्मिक परंपरा सदैव समाज को दिशा देती रही है। ऋषि-मुनियों की यह परंपरा आधुनिक युग में सत्य साई बाबा जैसे महापुरुषों के माध्यम से और भी प्रभावशाली रूप में सामने आई। उन्होंने मानवता को यह संदेश दिया कि मानव सेवा ही ईश्वर सेवा है और इसी विचार ने लाखों लोगों को सेवा, करुणा और नैतिक जीवन के मार्ग पर अग्रसर किया। बाबा ने आध्यात्म को निःस्वार्थ सेवा और व्यक्तिगत परिवर्तन से जोड़ कर आध्यात्मिकता का ऐसा मॉडल प्रस्तुत किया जिसमें समाज हित सर्वोच्च स्थान रखता है।

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राष्ट्रपति ने कहा कि सत्य साई बाबा का जीवन यह प्रमाण है कि आदर्शों को केवल कहा नहीं जाता, उन्हें जीया भी जाता है। उच्च गुणवत्ता वाली निःशुल्क शिक्षा प्रदान करने वाले सत्य साई सेंट्रल ट्रस्ट का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यहां शिक्षा केवल ज्ञान नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण का आधार भी है। निःशुल्क स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से बाबा का मिशन आज भी आगे बढ़ रहा है और यह सामाजिक न्याय के वास्तविक स्वरूप का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किया कि क्षेत्र के हजारों सूखा प्रभावित गांवों में पेयजल उपलब्ध कराना बाबा की दूरदर्शी सोच का परिणाम है।

राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि सत्य साई बाबा के संदेश-“सबसे प्रेम करो, सबकी सेवा करो” और “सदैव सहायता करो, कभी किसी को दु:ख न पहुंचाओ” केवल आध्यात्मिक उपदेश नहीं, बल्कि सार्वभौमिक मानवीय मूल्य हैं। सत्य, धर्म, शांति, प्रेम और अहिंसा को बाबा ने मानवीय जीवन का पाठ्यक्रम बताया। ये पंच मूल्यों की शिक्षा हर काल और हर संस्कृति के लिए समान रूप से प्रेरक है।

अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने स्पष्ट कहा कि राष्ट्र निर्माण केवल सरकार का कार्य नहीं है। हर संगठन, हर संस्था और हर नागरिक को ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना के साथ आगे बढ़ना होगा। उन्होंने कहा कि भारत सरकार लोगों के जीवन को सरल और सुगम बनाने के लिए अनेक कदम उठा रही है, लेकिन इन प्रयासों को तभी पूर्णता मिलेगी जब धर्मार्थ संस्थाएं, गैर-सरकारी संगठन और निजी क्षेत्र सक्रिय योगदान देंगे। राष्ट्रपति ने विश्वास जताया कि सामूहिक प्रयासों से भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के अपने लक्ष्य को अवश्य प्राप्त करेगा।

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