कोहरे की चादर में जकड़ा जनजीवन
- सड़कों पर रफ्तार थमी तो घरों में सिहरन बढ़ी। दैनिक जीवन मौसम की मार से जूझता नजर आया
Khabari Chiraiya Desk: कानपुर देहात में सर्दी अब सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि रोजमर्रा की चुनौती बन चुकी है। मंगलवार की सुबह जब लोग नींद से जागे तो सामने कोहरे की घनी चादर और हवा में चुभती ठंड ने पूरे जिले को जकड़ रखा था। ऐसा लगा मानो प्रकृति ने एक साथ अपनी पूरी ठंडक उडेल दी हो। गलन भरी हवा और सीमित दृश्यता ने दिन की शुरुआत को ही कठिन बना दिया, जिससे जनजीवन की रफ्तार स्वतः ही थम सी गई।
घना कोहरा इतना प्रभावी था कि कई स्थानों पर दृश्यता लगभग शून्य हो गई। सड़कें सामने होते हुए भी ओझल दिख रही थीं। हाईवे और प्रमुख मार्गों पर वाहन रेंगते नजर आए। चालक मजबूरी में हेडलाइट जलाकर धीरे-धीरे आगे बढ़े, लेकिन डर और सतर्कता हर चेहरे पर साफ दिखी। पहाड़ों पर हो रही बर्फबारी का असर मैदानी इलाकों तक पहुंच चुका है और इसका सीधा प्रभाव तापमान पर दिखाई दे रहा है। ठंडी हवा के साथ बढ़ी गलन ने सर्दी को और असहनीय बना दिया है।

मौसम की इस कठोरता ने आम आदमी की दिनचर्या को बुरी तरह प्रभावित किया। दफ्तर जाने वाले कर्मचारी ठिठुरते हुए घरों से निकले। जरूरी कामों के लिए बाहर निकलना किसी साहस से कम नहीं था। मॉर्निंग वॉक करने वाले लोगों की संख्या में साफ गिरावट देखने को मिली, क्योंकि खुले में कदम रखते ही ठंड शरीर को जकड़ ले रही थी। बच्चे भी सिकुड़ते हुए स्कूल की ओर जाते नजर आए, जिनके चेहरे पर ठंड से ज्यादा जल्दी पहुंचने की बेचैनी झलक रही थी।
सर्दी का असर सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं रहा। पशु पक्षी भी बेहाल नजर आए। खुले स्थानों में बैठे जानवर ठंड से बचने की कोशिश करते दिखे, वहीं पक्षियों की गतिविधियां भी सामान्य से कम हो गईं। गांवों और कस्बों में अलाव के आसपास लोग सिमटे दिखाई दिए, लेकिन पर्याप्त इंतजाम न होने से राहत सीमित ही रही।
रेल यातायात पर भी मौसम का साफ असर पड़ा। कोहरे के कारण ट्रेनों की गति कम कर दी गई, जिससे यात्रियों को लंबा इंतजार करना पड़ा। रूरा और झींझक जैसे रेलवे स्टेशनों पर यात्री ठंड में कांपते हुए देरी से आने वाली ट्रेनों का इंतजार करते रहे। प्लेटफॉर्म पर छाया और गर्माहट के समुचित इंतजाम न होने से यात्रियों की परेशानी और बढ़ गई।
यह स्थिति केवल मौसम की मार नहीं है, बल्कि व्यवस्थाओं की भी परीक्षा है। हर साल सर्दी आती है, कोहरा छाता है, लेकिन तैयारी हमेशा अधूरी नजर आती है। अलाव, रैन बसेरे, यात्रियों के लिए गर्म पानी और बच्चों व बुजुर्गों के लिए विशेष इंतजाम अभी भी जरूरत से कम हैं। ठंड से बचाव केवल व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता का भी विषय है।
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