गांधी की धरती पर असहाय ऑरवेल की विरासत
- मोतिहारी में विश्वविख्यात लेखक की जन्मस्थली बदहाली का शिकार है। ऐतिहासिक परिसर में असामाजिक गतिविधियों ने डेरा जमा लिया है
Khabari Chiraiya Desk : जिस धरती को दुनिया महात्मा गांधी के पहले सत्याग्रह की प्रयोगभूमि के रूप में पहचानती है, वहां एक और ऐतिहासिक विरासत की उपेक्षा का गवाह बन रहा है। मोतिहारी शहर विश्वप्रसिद्ध लेखक जॉर्ज ऑरवेल की जन्मस्थली भी है, लेकिन यह गौरवशाली पहचान अब बदहाली और प्रशासनिक अनदेखी के साए में सिमटती जा रही है। जिस स्थान को वैश्विक साहित्यिक मानचित्र पर सम्मान के साथ दर्ज होना चाहिए था, वह आज असुरक्षा और अव्यवस्था की मिसाल बन गया है।
बीसवीं सदी की शुरुआत में ऑरवेल के पिता रिचर्ड ब्लेयर मोतिहारी में ब्रिटिश अफीम विभाग में कार्यरत थे। इसी दौरान 25 जून 1903 को मिसकॉट क्षेत्र के एक आवास में एरिक आर्थर ब्लेयर का जन्म हुआ, जो आगे चलकर जॉर्ज ऑरवेल के नाम से दुनिया भर में प्रसिद्ध हुए। भले ही शैशवावस्था में ही वे इंग्लैंड चले गए हों, लेकिन उनकी जन्मभूमि ने मोतिहारी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दी। नाइनटीन एटी फोर और एनिमल फार्म जैसे उपन्यासों ने जिस लेखक को अमर बनाया, उसकी स्मृति आज अपने ही शहर में उपेक्षित पड़ी है।

कुछ वर्ष पहले इस स्थल को साहित्यिक धरोहर के रूप में विकसित करने की पहल की गई थी। राज्य सरकार और प्रशासनिक स्तर पर इसे संरक्षित स्मारक का रूप देने की बातें हुईं। पुरातत्व विभाग को जिम्मेदारी सौंपी गई और परिसर में ऑरवेल की प्रतिमा भी स्थापित की गई थी। उम्मीद जगी थी कि यह स्थान शोधार्थियों और साहित्य प्रेमियों के लिए प्रेरणास्रोत बनेगा। लेकिन समय के साथ यह उम्मीद टूटती चली गई।
आज स्थिति यह है कि ऑरवेल की प्रतिमा या तो क्षतिग्रस्त हो चुकी है या गायब है। जिस कमरे में एक महान लेखक ने जन्म लिया था, उसकी खिडकियां और दरवाजे उखाड़ लिए गए हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस ऐतिहासिक कक्ष का उपयोग मानव शौचालय के रूप में किया जा रहा है, जो सांस्कृतिक और ऐतिहासिक चेतना पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। इसके आसपास का परिसर नशेड़ियों और मनचले तत्वों का अड्डा बन चुका है, जिससे आम लोगों का वहां जाना भी मुश्किल हो गया है।
विडंबना यह है कि जिस चंपारण की धरती पर अफीम की खेती और उसके दुष्प्रभावों के खिलाफ गांधी ने संघर्ष की मशाल जलाई थी, उसी अफीम विभाग से जुड़े एक ऐतिहासिक आवास में आज नशे से जुड़ी गतिविधियों की चर्चा हो रही है। यह विरोधाभास न केवल शर्मनाक है, बल्कि हमारी विरासत के प्रति संवेदनहीनता को भी उजागर करता है।
इसके बावजूद चंपारण की मिट्टी की रचनात्मक शक्ति आज भी जीवित है। ऑरवेल की जन्मस्थली के समीप यादवपुर गांव से निकले साहित्यकार आज वैश्विक मंच पर अपनी पहचान बना रहे हैं। यह दिखाता है कि यह भूमि आज भी शब्दों की ताकत को संजोए हुए है, लेकिन व्यवस्थागत उदासीनता इस विरासत को धूमिल कर रही है।
स्थानीय बुद्धिजीवियों और साहित्य प्रेमियों की मांग है कि ऑरवेल की जन्मस्थली को तत्काल संरक्षित किया जाए और इसे सम्मानजनक स्वरूप दिया जाए।
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