February 5, 2026

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भारत-श्रीलंका संबंधों में नई ऊंचाई, बुद्ध धरोहर बना सेतु

  • प्रधानमंत्री की घोषणा के अनुरूप आयोजित इस प्रदर्शनी ने दोनों देशों के आध्यात्मिक जुड़ाव को और मजबूत किया, राजकीय सम्मान के साथ हुआ स्वागत

Khabari Chiraiya Desk: भारत और श्रीलंका के बीच सदियों पुराने आध्यात्मिक रिश्तों को एक बार फिर नई ऊंचाई मिली, जब भगवान बुद्ध के पवित्र देवनीमोरी अवशेष पूरे राजकीय सम्मान के साथ श्रीलंका पहुंचे। इन अवशेषों का आगमन केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच गहरे सभ्यतागत और सांस्कृतिक संबंधों का जीवंत प्रतीक बनकर सामने आया है।

भारतीय वायु सेना के विशेष विमान से कोलंबो पहुंचे पवित्र अवशेषों का स्वागत भारत-श्रीलंका के स्थापित प्रोटोकॉल के अनुरूप किया गया। गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत और उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी के नेतृत्व में उच्च स्तरीय भारतीय प्रतिनिधिमंडल अवशेषों के साथ श्रीलंका पहुंचा। प्रतिनिधिमंडल में वरिष्ठ बौद्ध भिक्षु, अधिकारी और अन्य विशिष्ट व्यक्तित्व भी शामिल थे, जो इस आयोजन के महत्व को रेखांकित करता है।

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कोलंबो के ऐतिहासिक गंगारामया मंदिर में इन पवित्र अवशेषों की प्रदर्शनी का उद्घाटन श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमार दिसानायके ने गुजरात के राज्यपाल और उपमुख्यमंत्री के साथ संयुक्त रूप से किया। इस अवसर पर गंगारामया मंदिर के मुख्य पुजारी डॉ. किरिंदे असाजी थेरो सहित श्रीलंका सरकार के कई वरिष्ठ मंत्री और गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। बुद्धशासन, धार्मिक और सांस्कृतिक मामलों के मंत्री डॉ. हिनिदुमा सुनील सेनेवी, स्वास्थ्य एवं जनसंचार मंत्री डॉ. नलिंदा जयतिसा तथा लोक प्रशासन मंत्री प्रो. एएचएमएच अबायरत्ना की मौजूदगी ने आयोजन को और गरिमा प्रदान की।

यह प्रदर्शनी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अप्रैल 2025 की श्रीलंका यात्रा के दौरान व्यक्त प्रतिबद्धता का प्रत्यक्ष परिणाम है। उस अवसर पर भारत ने बौद्ध सांस्कृतिक सहयोग को सशक्त करने और अनुराधापुरा के पवित्र नगर परिसर परियोजना के विकास के लिए अतिरिक्त सहायता की घोषणा की थी। इससे पहले वर्ष 2020 में बौद्ध संबंधों को बढ़ावा देने के लिए 15 मिलियन अमेरिकी डॉलर के अनुदान की घोषणा भी की जा चुकी थी। वर्तमान आयोजन उसी दीर्घकालिक दृष्टि का विस्तार माना जा रहा है।

गंगारामया मंदिर परिसर में पवित्र देवनीमोरी अवशेषों के साथ दो विशेष प्रदर्शनियां भी आरंभ की गईं, जिनमें पवित्र पिपरावा का अनावरण और समकालीन भारत के पवित्र अवशेष एवं सांस्कृतिक जुड़ाव पर केंद्रित प्रस्तुति शामिल है। पारंपरिक धार्मिक विधियों के साथ अवशेषों को मंदिर में स्थापित किया गया।

विशेष उल्लेखनीय यह भी है कि ये पवित्र अवशेष श्रीलंका के 78वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर वहां पहुंचे, जिससे आयोजन का प्रतीकात्मक महत्व और बढ़ गया। यह पहली बार है जब देवनीमोरी अवशेषों की सार्वजनिक प्रदर्शनी भारत के बाहर आयोजित की गई है। इससे पूर्व भारत ने वर्ष 2012 में कपिलवस्तु अवशेषों और 2018 में सारनाथ अवशेषों की प्रदर्शनी श्रीलंका में आयोजित की थी।

देवनीमोरी अवशेषों की यह प्रदर्शनी भगवान बुद्ध के करुणा, शांति और अहिंसा के संदेश की पुनर्पुष्टि है। यह आयोजन दर्शाता है कि ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के संबंधों की आधारशिला भी है। भारत और श्रीलंका के बीच यह सांस्कृतिक सेतु दोनों देशों के जनसंबंधों को और गहराई देगा तथा साझा बौद्ध परंपरा को नई ऊर्जा प्रदान करेगा।

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