February 10, 2026

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अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर गहराता संकट

America
  • अमेरिका में बैंक बंद होने, महाछंटनी और बढ़ती महंगाई ने चिंता बढ़ा दी है। आर्थिक विशेषज्ञों ने संभावित मंदी को लेकर गंभीर चेतावनी दी है

Khabari Chiraiya Desk : दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था माने जाने वाले अमेरिका में आर्थिक अस्थिरता के संकेत तेज होते जा रहे हैं। व्यापार नीतियों, महंगाई और बैंकिंग क्षेत्र में उभरती समस्याओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अमेरिका एक बड़े वित्तीय झटके की ओर बढ़ रहा है। हाल की घटनाओं ने न केवल अमेरिकी बाजारों को झकझोरा है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

साल 2026 की शुरुआत में शिकागो स्थित एक प्रमुख बैंक के बंद होने से बैंकिंग क्षेत्र की सेहत पर सवाल उठे। नियामक संस्था द्वारा हस्तक्षेप के बाद बैंक के परिसंपत्तियों को दूसरे वित्तीय संस्थान को सौंप दिया गया। इस कदम ने संकेत दिया कि वित्तीय प्रणाली पर दबाव बढ़ रहा है और नियामकों को एहतियाती कदम उठाने पड़ रहे हैं।

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उधर, रोजगार बाजार में भी स्थिति चिंताजनक है। वर्ष की शुरुआत में ही कंपनियों ने बड़े पैमाने पर कर्मचारियों की छंटनी की घोषणा की। जनवरी 2026 में लाखों नौकरियां प्रभावित होने की रिपोर्ट सामने आई, जो पिछले कई वर्षों में सबसे ऊंचे स्तरों में से एक है। विशेषज्ञों का मानना है कि कॉरपोरेट सेक्टर लागत घटाने की रणनीति अपना रहा है, जिससे उपभोक्ता मांग और आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।

महंगाई का दबाव भी अमेरिकी परिवारों पर बना हुआ है। उपभोक्ता खर्च सूचकांकों में लगातार बढ़ोतरी देखी गई है, जबकि केंद्रीय बैंक ने पहले स्थिरता की उम्मीद जताई थी। डॉलर की कमजोरी और कीमती धातुओं की कीमतों में तेजी को भी बाजार अस्थिरता का संकेत माना जा रहा है। निवेशक सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव बढ़ गया है।

कई अर्थशास्त्रियों ने आगाह किया है कि यदि सार्वजनिक ऋण और राजकोषीय दबाव पर नियंत्रण नहीं किया गया तो स्थिति गंभीर हो सकती है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि आगामी संकट 2008 की मंदी से अलग प्रकृति का हो सकता है, क्योंकि इस बार जोखिम सरकारी वित्तीय ढांचे से जुड़ा है। वैश्विक रेटिंग एजेंसियों और निवेश बैंकों ने भी अमेरिका में मंदी की आशंका जताई है।

अमेरिका की अर्थव्यवस्था में कमजोरी का असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर पड़ना स्वाभाविक है। भारत समेत कई देश व्यापार, निवेश और मुद्रा विनिमय के माध्यम से अमेरिका से जुड़े हैं। यदि अमेरिकी मांग घटती है या डॉलर में अस्थिरता बढ़ती है तो उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव आ सकता है।

फिलहाल दुनिया की निगाहें अमेरिकी नीति निर्माताओं पर टिकी हैं। आने वाले महीनों में मौद्रिक और राजकोषीय फैसले तय करेंगे कि यह संकट थमता है या वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक और बड़े दौर की परीक्षा से गुजरना पड़ेगा।

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