अप्रैल की आहट के साथ असम में चुनावी रणभेरी
- सत्ता की हैट्रिक का लक्ष्य और वापसी की जंग के बीच गरमाया पूर्वोत्तर का सियासी मैदान
Khabari Chiraiya Desk : राज्य में विधानसभा चुनाव की सरगर्मी तेज हो गई है और संकेत मिल रहे हैं कि मतदान अप्रैल के पहले सप्ताह में कराया जा सकता है। सूत्रों के अनुसार चुनाव आयोग मार्च 2026 के दूसरे सप्ताह में औपचारिक कार्यक्रम घोषित कर सकता है। संभावना है कि पूरा चुनाव एक ही चरण में संपन्न हो। पूर्वोत्तर के इस अहम राज्य में सियासी तापमान लगातार बढ़ रहा है और प्रमुख दल अपनी रणनीतियों को अंतिम रूप देने में जुट गए हैं।
सत्तारूढ़ भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का लक्ष्य लेकर मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। पार्टी ने साफ संकेत दिए हैं कि मौजूदा नेतृत्व पर ही भरोसा कायम रखा जाएगा। दो कार्यकाल पूरे कर चुके मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा को ही संभावित तौर पर फिर से मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाया जा सकता है। पार्टी का आकलन है कि राज्यभर में उनकी पकड़ और प्रशासनिक अनुभव चुनावी समीकरणों में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

भाजपा की प्रचार रणनीति भी लगभग तय मानी जा रही है। शीर्ष नेतृत्व, जिसमें Narendra Modi और Amit Shah शामिल हैं, राज्य में कई बड़ी सभाएं कर सकते हैं। पार्टी सीमा सुरक्षा, अवैध घुसपैठ, केंद्र और राज्य की कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन, महिला सशक्तिकरण तथा सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाने की योजना बना रही है।
दूसरी ओर कांग्रेस भी इस चुनाव को प्रतिष्ठा की लड़ाई के रूप में देख रही है। कभी असम की राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाली पार्टी अब सत्ता में वापसी की उम्मीद से संगठन को फिर से सक्रिय कर रही है। हालांकि अंदरूनी मतभेदों ने पार्टी को असहज स्थिति में ला दिया है। हाल ही में प्रदेश इकाई के भीतर नेतृत्व को लेकर उठा विवाद चर्चा का विषय बना रहा।
पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोराह द्वारा दिया गया इस्तीफा और फिर कुछ ही घंटों में उसे वापस लेना कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान को उजागर कर गया। उन्होंने वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष और सांसद गौरव गोगोई पर अप्रत्यक्ष रूप से नाराजगी जताई थी। हालांकि बाद में सुलह के संकेत भी मिले, लेकिन राजनीतिक हलकों में इस प्रकरण को कांग्रेस की कमजोरी के रूप में देखा जा रहा है।
भाजपा इस घटनाक्रम को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश कर सकती है। सूत्र बताते हैं कि पार्टी विपक्ष की एकजुटता पर सवाल उठाकर चुनावी विमर्श को अपने मुद्दों की ओर मोड़ना चाहती है। साथ ही संभावित सत्ता विरोधी माहौल को संतुलित करने के लिए कई मौजूदा विधायकों के टिकट पर भी पुनर्विचार किया जा सकता है।
असम की राजनीति इस समय बहुस्तरीय संघर्ष के दौर से गुजर रही है। एक ओर विकास और सुरक्षा के दावे हैं, तो दूसरी ओर संगठनात्मक मजबूती और नेतृत्व की विश्वसनीयता का सवाल। अप्रैल का पहला सप्ताह राज्य की राजनीति के भविष्य की दिशा तय कर सकता है। चुनावी बिगुल बजने से पहले ही असम में सत्ता की इस जंग ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।
यह भी पढ़ें… बिहार में प्राथमिक शिक्षक भर्ती की प्रक्रिया बदली, अब केवल CTET से होगी पात्रता
यह भी पढ़ें… मुंबई में मोदी और मैक्रों की ऐतिहासिक मुलाकात से मजबूत होगी भारत फ्रांस साझेदारी
आगे की खबरों के लिए आप हमारी वेबसाइट पर बने रहें...
