May 14, 2026

खबरी चिरईया

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ट्रंप की टैरिफ जंग से भारतीय निर्यात पर खतरे की घंटी

अमेरिकी कस्टम ड्यूटी का 50% तक पहुंचना भारतीय निर्यातकों के लिए गहरा झटका

Khabari Chiraiya New Delhi Desk: भारत के निर्यातक दशकों से अमेरिकी मांग के साथ ताल मिला कर चलते आए हैं। रूढ़ियों से ज़्यादा साख पर टिके रिश्ते, पतले मार्जिन पर खड़े कारोबार और हर मौसम में समय पर डिलीवरी, इसी ताने-बाने में अचानक टैरिफ की दीवार खड़ी हुई है। पहले अतिरिक्त 25% और अब “सेकेंडरी सैंक्शंस” के कारण प्रभावी कस्टम ड्यूटी का 50% तक पहुंच जाना। यह बदलाव सिर्फ़ एक लाइन-आइटम नहीं, पूरे बिज़नेस मॉडल पर सीधा वार है। जिन उद्योगों में प्रति जोड़ी जूते, प्रति शर्ट या प्रति पीस आभूषण की कमाई रुपये में दो अंकों से आगे नहीं जाती, वहां आधी कीमत के बराबर टैक्स की कल्पना ही संतुलन तोड़ देती है।

इसीलिए फैक्टरी फ़्लोर से बंदरगाह तक एक नई हड़बड़ी दिख रही है, जो माल पंद्रह दिनों में निकलता था, उसे चार हफ्ते पहले धकिया कर जहाज़ पर चढ़ाया जा रहा है। निर्यातक जानते हैं कि यह ‘एडवांस शिपमेंट’ कोई समाधान नहीं; यह बस तूफ़ान से पहले खिड़कियां जकड़ने जैसा है। असली चोट बिलिंग के समय लगेगी…जब खरीदार अपना मार्जिन बचाएगा, विक्रेता छूट की आख़िरी सीमा तक जाएगा और फिर भी कीमत ग्राहक के गले नहीं उतरेगी। जो ‘बर्डन-शेयरिंग’ 25% पर किसी तरह चल रही थी, 50% पर बौनी पड़ जाती है।

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सबसे बड़ा ज़ोर श्रम-प्रधान क्षेत्रों पर है…फ़ुटवियर, जेम्स-ज्वैलरी। यहां प्रतिस्पर्धा कीमत से शुरू होकर कीमत पर ही खत्म हो जाती है। तिरुपुर से गुरुग्राम और चेन्नई तक, अधिकांश इकाइयां क्रेडिट पर सांस लेती हैं…एलसी, पीओ और पोस्ट-शिपमेंट फाइनेंस पर। टैरिफ का झटका सिर्फ़ ऑर्डर बुक को नहीं, बैंकिंग जोखिम को भी बढ़ा रहा है। एक भी सीज़न ग़लत निकला तो नक़दी चेन टूटते देर नहीं लगेगी और तब नुकसान किसी एक फ़ैक्टरी का नहीं, पूरे क्लस्टर का होगा।

सरकार के पास विकल्प ज़रूर हैं, पर समय कम है। पहला, तात्कालिक एक लक्षित रेमिशन पैकेज जो वास्तविक ‘इंक्रीमेंटल’ टैरिफ-बोझ का हिस्सा कवर करे, ताकि फैक्ट्रियां सांस ले सकें। दूसरा, कूटनीतिक…वॉशिंगटन के साथ टैरिफ-रोलबैक या सेक्टोरल छूट के लिए आक्रामक बातचीत; अमेरिका के लिए भारत केवल सप्लाई-साइड लागत नहीं, सप्लाई-चेन स्थिरता भी है, इसी तर्क को मेज़ पर रखना होगा। तीसरा, संरचनात्मक…यूरोप, लैटिन अमेरिका और पूर्वी एशिया में बाज़ार विविधीकरण की तेज़ राह, ताकि एक झटके से पूरा पोर्टफ़ोलियो न डोले।

यह भी सच है कि हर संकट सुधार का द्वार खोलता है। अनुपालन, गुणवत्ता और डिज़ाइन-अपग्रेड के ज़रिये वैल्यू-एडिशन बढ़ाना अब ‘अच्छा-हो-तो’ वाली सूची में नहीं, ‘जरूरी’ की सूची में है। पर वैल्यू-एडिशन एक दिन में नहीं होता; उसके लिए पुल बनाना पड़ता है…स्किल, क्रेडिट और टेक्नोलॉजी का। इसीलिए नीति-निर्माताओं को अल्पकालीन राहत और दीर्घकालीन पुनर्बलन, दोनों साथ चलाने होंगे।

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