संजय पंकज को ऋषि पिंगल काव्य साधना पुरस्कार
- छंद की साधना में डूबे एक कवि को मिला राष्ट्रीय मान, गीत, लय और अनुशासन की परंपरा को समर्पित यह अलंकरण
Khabari Chiraiya Desk : गया जी की आध्यात्मिक व सांस्कृतिक आभा के बीच जब अखिल भारतीय काव्यमंच छंदशाला विद्यापीठ का वार्षिकोत्सव आरंभ हुआ तो वातावरण में शब्दों की सरगम और लय की मृदुल ध्वनि गूंज रही थी। इसी गरिमामय अवसर पर चर्चित कवि-गीतकार डॉ संजय पंकज को छंद साधना तथा निरंतर श्रेष्ठ गीत लेखन के लिए ऋषि पिंगल काव्य साधना पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह सम्मान केवल एक अलंकरण नहीं, बल्कि छंद के प्रति आजीवन निष्ठा का सार्वजनिक स्वीकार था।
समारोह में दार्शनिक कवि राशदादा, डॉ राम सिंहासन सिंह, डॉ देवराज शर्मा, आचार्य विजय गुंजन, श्याम बिहारी प्रभाकर, राजीव रंजन और कुमार कांत सहित अनेक साहित्यकारों ने संयुक्त रूप से पुष्पमाला, अंगवस्त्र, पुस्तकें, स्मृति चिह्न और सम्मान राशि प्रदान कर डॉ संजय पंकज का अभिनंदन किया। सभागार में उपस्थित साहित्यप्रेमियों ने तालियों की गूंज से इस क्षण को और भी स्मरणीय बना दिया।

संस्था के संस्थापक अध्यक्ष आचार्य विजय गुंजन ने अपने वक्तव्य में कहा कि संजय पंकज छंदसिद्ध कवि-गीतकार हैं। उन्होंने विविध छंदों में सौंदर्य और भावप्रवणता से युक्त रचनाएं की हैं। उनके गीत संग्रह मंजर मंजर आग लगी है, यहां तो सब बनजारे, शब्दों के फूल खिले और बजे शून्य में अनहद बाजा ने हिंदी साहित्य के विस्तृत आकाश में अपनी अलग पहचान बनाई है। विशेष रूप से दोहा छंद में रचित कृति मां है शब्दातीत शब्द नहीं मां चेतना को अनेक संत विद्वानों ने अपने प्रवचनों में उद्धृत किया है, जो उनकी काव्य संवेदना की व्यापक स्वीकृति का प्रमाण है।
अपने भावपूर्ण उद्गार व्यक्त करते हुए डॉ संजय पंकज ने कहा कि छंद जीवन को संतुलित और विशेष बनाता है। जीने की कला में लयात्मकता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लोक और जन स्वीकृति में छंदोबद्ध कविता ही प्रेरक और अनुकरणीय बन पाती है। उन्होंने हिंदी गीत-कविता के शिखर पुरुष आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री का स्मरण करते हुए कहा कि उनकी प्रेरणा और स्नेह से ही उनकी छंदप्रियता सुदृढ़ हुई। हिंदी कविता की स्वाभाविक प्रकृति छंद, लय, तुक और ताल में ही विकसित होती है। गीत की शाश्वत धारा छंद अनुशासन में ही आत्मीय और सुंदर बनती है।
समारोह केवल पुरस्कार वितरण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह छंद परंपरा की पुनर्पुष्टि का पर्व बन गया। गया की धरती पर दो दिनों तक शब्द, संगीत और विचार का ऐसा संगम साकार हुआ जिसने उपस्थित जनों को साहित्य की आत्मा से जोड़ दिया।
ऋषि पिंगल काव्य साधना पुरस्कार उस साधक को समर्पित है जो छंद को केवल शिल्प नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि मानकर रचना करता है। डॉ संजय पंकज की साधना इसी विश्वास की प्रतिध्वनि है। उनकी काव्य यात्रा यह प्रमाणित करती है कि जब शब्द लय से मिलते हैं, तब कविता केवल पाठ नहीं, अनुभव बन जाती है।
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