July 12, 2026

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बाबर के नाम पर मस्जिद निर्माण रोकने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट का इंकार

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  • देशव्यापी प्रतिबंध की मांग वाली याचिका पर शीर्ष अदालत ने सुनवाई नहीं की। ऐतिहासिक तर्कों और सामाजिक सौहार्द के मुद्दे को लेकर उठी थी अपील

Khabari Chiraiya Desk : देश भर में बाबर के नाम पर किसी भी मस्जिद के निर्माण या नामकरण पर रोक लगाने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इंकार कर दिया। शीर्ष अदालत के इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया कि फिलहाल इस मुद्दे पर न्यायिक हस्तक्षेप नहीं होगा। मामला ऐतिहासिक संदर्भों और वर्तमान सामाजिक संवेदनशीलता से जुड़ा होने के कारण व्यापक चर्चा का विषय बना हुआ है।

यह याचिका अयोध्या निवासी अधिवक्ता देवकीनंदन पांडेय की ओर से दायर की गई थी। इसमें केंद्र सरकार, विभिन्न राज्य सरकारों और एक राजनीतिक दल से जुड़े पूर्व नेता को पक्षकार बनाया गया था। याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि बाबर विदेशी आक्रांता था और उसके नाम पर देश में किसी भी धार्मिक स्थल का निर्माण या नामकरण उचित नहीं है। याचिका में ऐतिहासिक दस्तावेजों और बाबरनामा के अंशों का हवाला देते हुए यह तर्क रखा गया कि बाबर के शासनकाल में धार्मिक आधार पर संघर्ष हुए और मंदिरों पर हमले किए गए।

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याचिका में यह भी कहा गया कि अयोध्या में ऐतिहासिक विवाद से जुड़े घटनाक्रम के बाद सामाजिक शांति कायम हुई है, ऐसे में बाबर के नाम पर किसी भी नए निर्माण से कानून व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द प्रभावित हो सकता है। विशेष रूप से मुर्शिदाबाद में कथित रूप से बाबर के नाम पर मस्जिद निर्माण के प्रयासों का उल्लेख करते हुए आशंका जताई गई कि इससे सामुदायिक तनाव बढ़ सकता है।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध थी। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता आलोक मिश्रा ने दलीलें पेश कीं और अदालत से हस्तक्षेप की मांग की। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर विचार करने से इंकार करते हुए कोई विस्तृत आदेश पारित नहीं किया।
शीर्ष अदालत के इस रुख को कई कानूनी विशेषज्ञ संवैधानिक सीमाओं और अभिव्यक्ति तथा धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे में देखते हैं। उनका मानना है कि किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व के नाम पर निर्माण या नामकरण का प्रश्न व्यापक नीतिगत और सामाजिक विमर्श का विषय हो सकता है, परंतु न्यायालय केवल उन्हीं मामलों में हस्तक्षेप करता है जहां स्पष्ट कानूनी उल्लंघन या संवैधानिक प्रश्न उपस्थित हो।

इस प्रकरण ने एक बार फिर इतिहास, आस्था और समकालीन राजनीति के जटिल संबंधों को उजागर किया है। जहां एक पक्ष ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर आपत्ति जता रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक विविधता के संदर्भ में देखता है।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के सुनवाई से इंकार के बाद यह मामला न्यायिक स्तर पर आगे नहीं बढ़ेगा। हालांकि, सामाजिक और राजनीतिक मंचों पर इस विषय पर बहस जारी रहने की संभावना है।

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