प्रसव की पीड़ा और व्यवस्था की विफलता
- बहराइच की घटना ने उजागर की ग्रामीण मातृ स्वास्थ्य की कड़वी सच्चाई। सवाल यह नहीं कि एक महिला ने क्या किया, सवाल यह है कि वह अकेली क्यों थी?
Khabari Chiraiya Desk : बहराइच जिले से सामने आई एक घटना केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है, बल्कि यह हमारे ग्रामीण स्वास्थ्य तंत्र की गहरी दरारों को उजागर करती है। प्रसव जैसी स्वाभाविक और संवेदनशील प्रक्रिया, जो देखभाल और सहयोग की मांग करती है, कई गांवों में अब भी जोखिम और असुरक्षा का पर्याय बनी हुई है। जब एक 32 साल की गर्भवती महिला प्रसव पीड़ा में अकेली छटपटाती है और दर्द असहनीय होने पर घबराहट में धारदार औजार से अपने पेट पर वार कर लेती है। यह कदम उसकी जान के लिए बेहद खतरनाक साबित हुआ और वह बुरी तरह घायल हो गई। बाद में उसे अस्पताल पहुंचाया गया।
महिला लंबे समय से पति के निधन के बाद बच्चों की जिम्मेदारी अकेले निभा रही थी। आर्थिक तंगी, सामाजिक दबाव और मानसिक तनाव पहले से ही उसके जीवन का हिस्सा थे। प्रसव के समय घर में कोई मददगार न होना और अचानक असहनीय दर्द का उठना, किसी भी व्यक्ति को मानसिक रूप से विचलित कर सकता है। ऐसे क्षणों में विवेक की जगह घबराहट हावी हो जाती है। यह समझना जरूरी है कि यह घटना किसी सनसनी की कहानी नहीं, बल्कि उस अकेलेपन की दास्तान है जिसमें ग्रामीण महिलाएं अक्सर खुद को पाती हैं।

स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता पर वर्षों से योजनाएं बनती रही हैं। जननी सुरक्षा, एंबुलेंस सेवा, आशा कार्यकर्ताओं की नियुक्ति और संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने जैसे कार्यक्रम कागजों पर प्रभावी दिखते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि कई दूरदराज क्षेत्रों में प्रशिक्षित दाई या डॉक्टर समय पर उपलब्ध नहीं हो पाते। एंबुलेंस की पहुंच, सड़कों की स्थिति और जागरूकता का स्तर आज भी चुनौती बना हुआ है।
इस घटना में नवजात बच्ची का सुरक्षित होना राहत की बात है, पर मां की गंभीर स्थिति हमें झकझोरती है। डॉक्टरों का कहना है कि समय पर उपचार मिलता तो हालत इतनी न बिगड़ती। यही वह बिंदु है जहां हमें ठहरकर सोचना होगा। क्या हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था प्रसव को आपात स्थिति मानकर तत्पर रहती है? क्या हर गांव तक ऐसी व्यवस्था पहुंची है जो किसी भी गर्भवती महिला को अकेला न छोड़े?
यह भी सच है कि मातृ स्वास्थ्य केवल चिकित्सा का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक समर्थन का प्रश्न भी है। विधवा और आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं के लिए सामुदायिक सहयोग, मानसिक स्वास्थ्य परामर्श और नियमित जांच की सुविधा अनिवार्य होनी चाहिए। समाज और प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी है कि ऐसी परिस्थितियां दोबारा न बनें जहां भय और दर्द किसी महिला को आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर कर दें।
मातृत्व को सुरक्षित बनाना केवल अस्पतालों का काम नहीं, बल्कि यह सामूहिक जिम्मेदारी है। गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं की सुदृढ़ उपस्थिति, गर्भवती महिलाओं की नियमित निगरानी और आपातकालीन सहायता की त्वरित व्यवस्था ही ऐसी त्रासदियों को रोक सकती है।
जब तक हर गर्भवती महिला यह भरोसा महसूस नहीं करेगी कि प्रसव के समय वह अकेली नहीं है, तब तक विकास के दावे अधूरे रहेंगे। बहराइच की यह घटना हमें याद दिलाती है कि सच्चा विकास आंकड़ों में नहीं, बल्कि सुरक्षित मातृत्व में दिखता है।
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