जब भाषा बनी अधिकार की आवाज
- 1948 में बिहार विधानसभा में उठा ऐतिहासिक प्रस्ताव। डॉ. मुखर्जी ने विविधता के सम्मान की रखी मजबूत नींव
Khabari Chiraiya Desk : जब हम अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाते हैं तो यह केवल एक प्रतीकात्मक तिथि नहीं होती, बल्कि भाषा, पहचान और आत्मसम्मान के गहरे रिश्ते को याद करने का अवसर भी होती है। बिहार और झारखंड के इतिहास में एक ऐसा अध्याय दर्ज है, जिसने यह साबित किया कि मातृभाषा का प्रश्न राजनीति से ऊपर, नागरिक अधिकारों का प्रश्न है।
स्वतंत्रता के तुरंत बाद का दौर था। देश अपने प्रशासनिक और संवैधानिक ढांचे को आकार दे रहा था। इसी क्रम में बिहार विधानसभा में राज्य की राजभाषा को लेकर गंभीर बहस हुई। बहुमत की भावना हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार करने की थी, लेकिन इस बहस के बीच एक ऐसी आवाज़ उठी, जिसने चर्चा को नई दिशा दी। वह आवाज़ थी दुमका के विधायक और विद्वान शिक्षाविद् डॉ. लम्बोदर मुखर्जी की।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि राजभाषा का सम्मान आवश्यक है, परंतु मातृभाषा का अधिकार उससे कम महत्वपूर्ण नहीं हो सकता। उनका मानना था कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपने नागरिकों की भाषाई विविधता को कितना सम्मान देती है। यदि शासन किसी समुदाय पर उसकी इच्छा के विरुद्ध भाषा थोपता है, तो वह नैतिक आधार खो देता है।
विधानसभा में जब यह सुझाव सामने आया कि राज्य की एकता के लिए सभी समुदायों पर हिंदी को अनिवार्य रूप से लागू किया जाए, तब डॉ. मुखर्जी ने संयमित किंतु दृढ़ स्वर में इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि जिन क्षेत्रों में बंगाली भाषी आबादी अधिक है, वहां न्यायिक और प्रशासनिक कार्यवाही उसी भाषा में होनी चाहिए, जिसे लोग समझते हों। न्याय तभी सार्थक है, जब वह भाषा की बाधा से मुक्त हो।
उनकी सोच टकराव की नहीं, संतुलन की थी। वे हिंदी के विरोधी नहीं थे, बल्कि यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि राजभाषा का विस्तार स्वैच्छिक सम्मान से हो, न कि अनिवार्य दबाव से। यही दृष्टिकोण आज भी संघीय ढांचे और भाषाई सहअस्तित्व की बुनियाद माना जाता है।
डॉ. लम्बोदर मुखर्जी का योगदान केवल विधानमंडल तक सीमित नहीं था। वे शिक्षा और सांस्कृतिक चेतना के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे। बिहार बंगाली संगठन से जुड़कर उन्होंने शिक्षा संस्थानों को सशक्त किया। चंपारण क्षेत्र में बांग्ला शिक्षा के विकास में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके नेतृत्व में विद्यालयों ने शैक्षणिक उपलब्धियों के साथ सांस्कृतिक पहचान को भी सहेजा।
आज जब वैश्वीकरण और तकनीकी विस्तार के दौर में भाषाएं नई चुनौतियों का सामना कर रही हैं, तब यह इतिहास हमें याद दिलाता है कि विकास और विविधता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। मातृभाषा व्यक्ति की पहली पहचान होती है। उसी के माध्यम से वह दुनिया को समझता और अभिव्यक्त करता है।
अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, स्मृति और सामूहिक चेतना की धरोहर है। डॉ. लम्बोदर मुखर्जी जैसे जनप्रतिनिधियों की दूरदर्शिता ने यह संदेश दिया कि सच्ची एकता विविधताओं को मिटाकर नहीं, उन्हें सम्मान देकर बनती है।
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