March 20, 2026

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बिहार : तारापुर, लखीसराय और कटिहार में सत्ता पक्ष की प्रतिष्ठा दांव पर

  • जातीय गणित, नाराजगी और स्थानीय समीकरणों ने मुकाबला किया दिलचस्प, परंपरागत वोट बैंक से लेकर बिंद और वैश्य समाज तक, हर वोट बना निर्णायक हथियार

Khabari Chiraiya Desk: बिहार की सियासी पिच पर इस बार मुकाबला सिर्फ उम्मीदवारों का नहीं, बल्कि उपमुख्यमंत्रियों की कुर्सी और सत्ता की प्रतिष्ठा का भी है। तीन सीटें हैं और तीनों पर मैदान में बेहद बड़े चेहरे। भाजपा के दोनों उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा के साथ साथ पूर्व उपमुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद अपनी-अपनी साख बचाने के लिए हर मोर्चे पर डटे हुए हैं।

इन चुनावों ने साफ कर दिया है कि राज्य की राजनीति का भविष्य इन तीन विधानसभा क्षेत्रों की धड़कनों में छिपा है। जहां वोटर सिर्फ विकास या वादों से नहीं, बल्कि जातीय समीकरण, पुरानी नाराजगियों और भावनात्मक जोड़ से भी प्रभावित हो रहे हैं। तारापुर वह रणभूमि है जिसने बिहार में सत्ता संतुलन के मायने बदल दिए हैं। पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ रहे सम्राट चौधरी के सामने सीधा चैलेंज राजद समर्थित वैश्य उम्मीदवार अरुण कुमार का है।

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Panchayat Voice

कुशवाहा वोटरों का भारी दबदबा एनडीए के लिए संजीवनी की तरह है। वहीं सकलदेव बिंद के समर्थन ने 25 हजार से अधिक बिंद मतदाताओं को समीकरण में झोंककर हवा बदल दी है। छह बार विधायक रह चुके शकुनी चौधरी पूरी ताकत झोंक चुके हैं। जीत मिली तो सम्राट की नेतृत्व क्षमता पर मुहर लगेगी, हार हुई तो यह सिर्फ हार नहीं बल्कि एनडीए का मनोबल गिराने वाला झटका होगी।

लखीसराय में चुनावी मौसम इस बार ज्यादा तप रहा है। तीन बार से जीत रहे विजय सिन्हा, इस बार विपक्ष से दोगुनी ताकत का सामना कर रहे हैं। कांग्रेस उम्मीदवार अमरेश अनीश को बड़हिया और टाल क्षेत्र में पहले से ही मजबूत समर्थन है, ऊपर से पूर्व विरोधी अब उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं।

व्यापारी वर्ग और शहर में सिन्हा की पकड़ कायम है, लेकिन गांव की गलियों में असंतोष और विकास की धीमी रफ्तार चुनाव को कांटे की लड़ाई में तब्दील कर चुकी है। कटिहार में मुकाबला दिल और दिमाग दोनों पर खेला जा रहा है। लगातार पांचवीं बार मैदान में उतरने वाले तारकिशोर प्रसाद को इस बार पार्टी के ही वैश्य वोट बैंक में सेंध लगने का डर सता रहा है।

अशोक अग्रवाल के बेटे सौरभ अग्रवाल की एंट्री ने चुनाव को पारिवारिक और कारोबारी भावनाओं का जंग बना दिया है। वहीं जनसुराज के गाजी शरीफ मुस्लिम मतों को एकजुट करने में जुटे हुए हैं। यानी शहर भाजपा के साथ दिखाई देता है, लेकिन देहात में समीकरण हर बीतते दिन के साथ फिसलते जा रहे हैं।

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