June 24, 2026

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छठ महापर्व : जिस छठी मैया की पूजा की जाती है, जानें कौन हैं छठी मैया

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  • छठ महापर्व में जिस छठी मैया की पूजा की जाती है, वे वास्तव में स्कंदमाता यानी माता पार्वती का दिव्य स्वरूप मानी जाती हैं

Khabari Chiraiya Desk: छठ महापर्व के दौरान व्रती महिलाएं संध्या और प्रभात में सूर्य देव को अर्घ्य देती हैं और छठी मैया की पूजा करती हैं। लेकिन आखिर यह छठी मैया कौन हैं? शोध और धार्मिक ग्रंथ बताते हैं कि छठी मैया स्कंदमाता यानी माता पार्वती का वह स्वरूप हैं, जो संतान की रक्षा, परिवार की सुख-समृद्धि और आरोग्य का आशीर्वाद देती हैं। यही कारण है कि इस व्रत का केंद्र संतान-सुख और परिवार के मंगल की मनोकामना रहा है।

हजारों वर्षों से छठ का अनंत इतिहास

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छठ पूजा भारत की उन परंपराओं में से एक है जिसका इतिहास समय की धूल में दबा नहीं, बल्कि और चमकता गया है। इस महान पर्व का प्रचलन गुप्तकाल से प्रमाणित मिलता है। उस काल में चलन वाले सिक्कों पर “षष्ठीदत्त” नाम पाया गया है। संस्कृत व्याकरण के अनुसार इस नाम का अर्थ है-षष्ठी देवी (छठी मैया) के आशीर्वाद से जन्मा बालक। यह प्रमाण बताता है कि छठी मैया की पूजा गुप्तकाल में भी जन-जन की आस्था का केंद्र रही थी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के विद्वान वासुदेव शरण अग्रवाल ने अपने शोध में इसका स्पष्ट उल्लेख किया है।

धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है विस्तार से वर्णन

मिथिला के महान विद्वान चंडेश्वर ने 1300 ईस्वी में अपने ग्रंथ कृत्य रत्नाकर में छठ पूजा का उल्लेख किया। इसके बाद 15वीं शताब्दी में रूद्रधर ने अपने ग्रंथ में चार दिवसीय छठ व्रत का वही स्वरूप लिखा जो आज भी प्रचलित है। इतना ही नहीं, 1130 ईस्वी में लक्ष्मीधर और 1285 ईस्वी में हेमाद्री ने षष्ठी व्रत और सूर्योपासना का विस्तृत विधान प्रस्तुत किया। यह दर्शाता है कि कम-से-कम 700 से 900 साल से इस पर्व का आज वाला स्वरूप सुरक्षित है।

सूर्य को अर्घ्य देने का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व

सूर्य जीवन का आधार हैं। वैदिक काल से सूर्य उपासना भारत की मुख्य परंपरा रही है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि सूर्य की विशेष पूजा के लिए श्रेष्ठ मानी गई है। इसी कारण छठ के अंतिम दिन उदीयमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। मान्यता है कि सूर्य की किरणें रोगों का नाश करती हैं और जीवन में ऊर्जा भरती हैं।

भारत के बाहर भी सूर्य मंदिरों की जगमगाती परंपरा

मुल्तान (अब पाकिस्तान) और काबुल के पास खैर कन्हेर में सूर्य भगवान के विशाल मंदिर थे। अरब यात्रियों और ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि इन मंदिरों में सूर्य उपासना का प्रभाव अत्यंत व्यापक था। हालांकि विदेशी हमलों में मंदिर नष्ट हुए, लेकिन खुदाई में मिली मूर्तियां आज भी इतिहास को जिंदा रखे हुए हैं।

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