March 21, 2026

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नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन पर चिंता, मौत की सजा पर उठे गंभीर सवाल

  • निचली अदालतों के फैसलों और उच्च न्यायालयों की समीक्षा में बड़ा अंतर

Khabari Chiraiya Desk: भारत की आपराधिक न्याय व्यवस्था में मौत की सजा को लेकर हालिया अध्ययन ने कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े कर दिए हैं। एक दशक के आंकड़ों के विश्लेषण से यह संकेत मिला है कि निचली अदालतों द्वारा सुनाई गई फांसी की सजाओं का बड़ा हिस्सा उच्च न्यायालयों में टिक नहीं पा रहा है। इससे न्यायिक प्रक्रिया की गुणवत्ता और मानकों पर व्यापक बहस छिड़ गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दस वर्षों में सत्र न्यायालयों ने 1,310 अभियुक्तों को मृत्युदंड सुनाया, लेकिन उच्च न्यायालयों ने इनमें से केवल 70 मामलों में ही सजा को बरकरार रखा। यह अंतर दर्शाता है कि अपीलीय स्तर पर बड़ी संख्या में फैसलों में बदलाव या निरस्तीकरण हुआ है। सुप्रीम कोर्ट की भूमिका भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय रही है।

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हाल के वर्षों में शीर्ष अदालत ने मृत्युदंड की पुष्टि करने में अत्यधिक सावधानी बरती है। वर्ष 2023 से 2025 के बीच सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी मामले में फांसी की सजा की पुष्टि नहीं की। वहीं 2025 में अदालत के समक्ष आए 19 मामलों में से 10 में आरोपियों को पूर्ण रूप से बरी कर दिया गया, जो पिछले कई वर्षों की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि है।

अगस्त 2025 में एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मृत्युदंड सुनाने से पहले निष्पक्ष और व्यापक सुनवाई अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि आरोपी के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक पृष्ठभूमि और जेल रिकॉर्ड का समुचित मूल्यांकन किए बिना दी गई सजा मौलिक अधिकारों के विपरीत मानी जाएगी।

हालांकि, रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जमीनी स्तर पर इन दिशानिर्देशों का पूर्ण पालन नहीं हो पा रहा है। वर्ष 2025 में सत्र न्यायालयों के 83 मामलों में से 79 में आवश्यक मानकों का पालन न होने की बात सामने आई। कई मामलों में दोषसिद्धि और सजा एक ही दिन सुना दी गई, जिससे आरोपी के व्यक्तिगत और मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन का अवसर सीमित रह गया।

ट्रायल कोर्ट से लगातार आ रही सजाओं के कारण देश में मृत्युदंड पाए कैदियों की संख्या बढ़कर 31 दिसंबर 2025 तक 574 हो गई, जो 2016 के बाद का उच्चतम स्तर है। केवल वर्ष 2025 में ही 128 लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई। राज्यवार आंकड़ों में उत्तर प्रदेश में मृत्युदंड पाए कैदियों की संख्या सबसे अधिक बताई गई है, जबकि गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, केरल और कर्नाटक भी इस सूची में प्रमुख रूप से शामिल हैं।

रिपोर्ट में बिना छूट वाली आजीवन कारावास की सजा पर भी चिंता जताई गई है। इसमें कहा गया है कि इस प्रकार की सजा व्यक्ति से भविष्य की आशा छीन लेती है और इसके लिए स्पष्ट कानूनी ढांचे की आवश्यकता है। यह अध्ययन न्यायिक प्रणाली में मृत्युदंड के उपयोग, उसके मानकों और प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर व्यापक विमर्श की आवश्यकता की ओर संकेत करता है।

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