कश्मीर पर राग अलापते पाकिस्तान को भारत ने फिर लताड़ा
- संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत ने दिया सख्त जवाब, राजदूत पर्वतनेनी हरीश ने कहा, झूठे और पक्षपातपूर्ण विमर्श की कोई जगह नहीं
एनके मिश्रा, नई दिल्ली
संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंचों की स्थापना दुनिया में शांति, सहयोग और अंतरराष्ट्रीय समझ को मजबूत करने के उद्देश्य से की गई थी। लेकिन समय-समय पर कुछ देश इन मंचों का उपयोग अपने राजनीतिक हितों को साधने और पुराने विवादों को जीवित रखने के लिए भी करते रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा में पाकिस्तान द्वारा एक बार फिर जम्मू-कश्मीर का मुद्दा उठाया जाना इसी प्रवृत्ति का उदाहरण माना जा रहा है। भारत ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए न केवल पाकिस्तान के दावों को खारिज किया, बल्कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की जिम्मेदारियों और उसमें सुधार की आवश्यकता का मुद्दा भी मजबूती से उठाया।

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पर्वतनेनी हरीश ने पाकिस्तान की टिप्पणी का जवाब देते हुए स्पष्ट कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का पूर्णतः आंतरिक मामला है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न और अविभाज्य अंग था, है और हमेशा रहेगा। भारत का यह रुख कोई नया नहीं है, बल्कि दशकों से लगातार दोहराई जा रही उसकी स्थापित नीति का हिस्सा है। भारतीय पक्ष का मानना है कि पाकिस्तान द्वारा किए जाने वाले दावे न तो ऐतिहासिक तथ्यों से मेल खाते हैं और न ही वर्तमान वास्तविकताओं को बदल सकते हैं।
पाकिस्तान लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र समेत विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जम्मू-कश्मीर का मुद्दा उठाता रहा है। इस बार भी संयुक्त राष्ट्र महासभा में सुरक्षा परिषद की वार्षिक रिपोर्ट पर चर्चा के दौरान पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि आसिम इफ्तिखार अहमद ने इस विषय को उठाया। भारत ने इसे एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंचों के राजनीतिक दुरुपयोग का उदाहरण बताया। विशेष रूप से इसलिए भी क्योंकि पाकिस्तान इस समय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य है और उसका कार्यकाल इसी वर्ष समाप्त होने वाला है।
भारत की प्रतिक्रिया केवल कश्मीर तक सीमित नहीं रही। राजदूत हरीश ने पाकिस्तान पर सुरक्षा परिषद में अपनी उपस्थिति का दुरुपयोग करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने कई अवसरों पर गलत सूचनाएं और भ्रामक संदेश फैलाने का प्रयास किया है। भारत का स्पष्ट मत है कि सुरक्षा परिषद की सदस्यता किसी देश के लिए सम्मान के साथ-साथ बड़ी जिम्मेदारी भी होती है। यह मंच पक्षपातपूर्ण और झूठे विमर्श फैलाने के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक शांति और सुरक्षा को मजबूत करने के लिए है।
इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की बहस से जुड़ा है। भारत लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि वर्तमान सुरक्षा परिषद आज की दुनिया की वास्तविकताओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती। इसकी संरचना 1945 की भू-राजनीतिक परिस्थितियों को दर्शाती है, जबकि वैश्विक शक्ति संतुलन, आर्थिक केंद्र और अंतरराष्ट्रीय चुनौतियां अब काफी बदल चुकी हैं। भारत का मानना है कि यथास्थिति बनाए रखने से परिषद की प्रभावशीलता और विश्वसनीयता दोनों प्रभावित होती हैं।
भारत ने यह भी याद दिलाया कि 1960 के दशक में सुरक्षा परिषद में जो सुधार किए गए थे, वे केवल अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने तक सीमित थे। इससे परिषद के मूल ढांचे में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। आज आवश्यकता इस बात की है कि स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों में विस्तार किया जाए, ताकि अधिक देशों को प्रतिनिधित्व मिल सके और वैश्विक निर्णय प्रक्रिया अधिक लोकतांत्रिक बन सके।
इसी उद्देश्य से भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान के जी-4 समूह ने सुरक्षा परिषद की सदस्य संख्या वर्तमान 15 से बढ़ाकर 25 या 26 करने का प्रस्ताव रखा है। इस प्रस्ताव के अनुसार परिषद में 11 स्थायी सदस्य और 14 या 15 अस्थायी सदस्य हो सकते हैं। वर्तमान में सुरक्षा परिषद में चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका पांच स्थायी सदस्य हैं, जबकि अन्य दस सदस्य दो वर्ष के कार्यकाल के लिए चुने जाते हैं। भारत स्वयं 2021-22 में अस्थायी सदस्य के रूप में परिषद का हिस्सा रह चुका है।
कश्मीर को लेकर पाकिस्तान की ताजा बयानबाजी और भारत की प्रतिक्रिया केवल एक राजनयिक बहस नहीं है। यह उस व्यापक प्रश्न की भी याद दिलाती है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का उपयोग किस उद्देश्य से होना चाहिए। यदि वैश्विक मंचों का इस्तेमाल राजनीतिक प्रचार और भ्रामक कथानक गढ़ने के लिए किया जाएगा, तो उनकी विश्वसनीयता प्रभावित होगी। वहीं यदि इन्हें वास्तविक समस्याओं के समाधान और वैश्विक सहयोग के लिए उपयोग किया जाए, तो वे आज भी विश्व व्यवस्था के सबसे प्रभावी स्तंभ साबित हो सकते हैं। यही कारण है कि भारत एक ओर अपने राष्ट्रीय हितों की मजबूती से रक्षा करता है और दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, जवाबदेह और प्रभावी बनाने की मांग भी लगातार उठाता रहा है।

