May 14, 2026

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नेपाल सरकार झुकी, सोशल मीडिया बैन वापस

सोशल मीडिया बैन
  • 14 मौतों और सैकड़ों घायलों के बाद हालात इतने बिगड़े कि सरकार को अपना निर्णय पलटना पड़ा

Khabari Chiraiya Desk : नेपाल सरकार ने अंततः फेसबुक, इंस्टाग्राम, वॉट्सऐप और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स पर लगाए गए प्रतिबंध को वापस ले लिया है। संचार, सूचना और प्रसारण मंत्री पृथ्वी सुब्बा गुरुंग ने घोषणा की कि संबंधित एजेंसियों को सभी सोशल मीडिया साइटों को फिर से चालू करने का आदेश दिया गया है। यह निर्णय उस दबाव का परिणाम है, जो पूरे देश में देखने को मिला।

बैन लागू होते ही नेपाल की डिजिटल पीढ़ी यानी Gen-Z सड़कों पर उतर आई। राजधानी काठमांडू के बानेश्वर से शुरू हुए विरोध ने कुछ ही घंटों में हिंसक रूप ले लिया। संसद परिसर तक प्रदर्शनकारियों का पहुंचना और पुलिस की गोलीबारी में 14 लोगों की मौत होना इस बात का प्रमाण है कि सरकार ने जनता की नब्ज़ पढ़ने में भारी भूल की। सौ से अधिक घायल और कई पत्रकारों पर भी गोलियां चलना लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को गहरी चोट पहुंचाता है।

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दरअसल, सरकार चाहती थी कि सोशल मीडिया कंपनियां नेपाल में दफ्तर खोलकर रजिस्ट्रेशन कराएं और स्थानीय कानूनों के तहत जवाबदेह बनें। यह मांग तर्कसंगत लग सकती है, लेकिन जिस तरह अचानक प्लेटफॉर्म्स पर रोक लगा दी गई, उसने आम नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी पर सीधा असर डाला। डिजिटल युग की पीढ़ी संवाद, शिक्षा, व्यवसाय और सामाजिक जुड़ाव के लिए इन्हीं प्लेटफॉर्म्स पर निर्भर है। ऐसे में यह कदम उनके अधिकारों पर सीधा प्रहार था।

नेपाल का यह अनुभव बताता है कि तकनीकी युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल अधिकार अविभाज्य हो चुके हैं। किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए यह स्वीकार करना ज़रूरी है कि सोशल मीडिया अब केवल मनोरंजन का जरिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र का मंच है। यही कारण है कि सेना और कर्फ्यू के बावजूद भी जनता का गुस्सा थमा नहीं और अंततः सरकार को पीछे हटना पड़ा।

आगे का रास्ता यही है कि नेपाल सरकार संवाद का पूल बनाए। यदि जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करनी है तो कंपनियों से बातचीत कर ठोस ढांचा तैयार किया जाए, ताकि डिजिटल स्वतंत्रता और राष्ट्रीय हितों में संतुलन कायम हो सके।

अंततः, यह घटनाक्रम इस सच्चाई को रेखांकित करता है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज़ सबसे ताकतवर होती है। सरकारें चाहे जितना कठोर कदम उठा लें, लेकिन अंत में जीत उसी विचार की होती है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों को सम्मान देता है।

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