June 9, 2026

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11 साल की सरकार…और नाम बदलने की राजनीति

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  • यह सत्ता की उस सोच को दिखाता है, जो इतिहास को नए सिरे से गढ़ना चाहती है

Khabari Chiraiya Desk : भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने 11 वर्षों में कौन से ऐसे 11 बड़े कार्य किए हैं, जिनके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इतिहास के पन्नों में याद किया जाए। क्या प्रधानमंत्री मोदी गुजरात में जन्म लेने वाले महात्मा गांधी और सरदार वल्लभभाई पटेल को राजनीतिक दृष्टि और अपनी उपलब्धियों के मामले में पीछे छोड़ चुके हैं। क्या वह इन दोनों नेताओं के सामने वी बी जी राम जी योजना के माध्यम से, मनरेगा का नाम बदलकर, इतिहास में अपना नाम दर्ज कराना चाहते हैं।

यह सर्वविदित है कि नरेगा के आगे महात्मा गांधी का नाम जोड़कर इसे मनरेगा बनाया गया था, लेकिन अब जो नाम परिवर्तन किया गया है, वह एक नए ‘राम जी’ के नाम का अवतार प्रतीत होता है। चाहे जो भी हो, गुजरात से आने वाले देश के प्रधानमंत्री ने इतना तो अवश्य किया है कि अपने ही गुजरात के और इस देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को इस योजना से अलग करने में कोई हिचक नहीं दिखाई। आज की तारीख में महात्मा गांधी भी उस सूची में शामिल हो गए हैं, जिसमें पहले से जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नाम मौजूद थे।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में कांग्रेस सरकारों की कई योजनाओं के नाम बदले गए हैं। यह एक लंबी कथा है। शायद इस देश की जनता को यह याद है या वह भूल चुकी है, कहना कठिन है। अहमदाबाद स्थित सरदार पटेल स्टेडियम का नाम बदलकर नरेंद्र मोदी स्टेडियम किया जाना इसी सरकार के कार्यकाल में हुआ। वैसे, यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महात्मा गांधी और सरदार पटेल से भी बड़ी कोई रेखा गुजरात की धरती और इस देश की धरती पर खींच लेते हैं, तो निश्चित रूप से वह स्वागत योग्य, स्मरणीय और इतिहास के पन्नों में दर्ज होने योग्य होगा।

यह कहना उचित नहीं होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 वर्षों में ऐसे कोई कार्य नहीं किए जिनकी चर्चा होनी चाहिए, लेकिन नाम परिवर्तन के विवादास्पद मामले हों या नोटबंदी जैसे फैसले, जम्मू-कश्मीर का मुद्दा हो या मणिपुर की घटना, ऐसी घटनाओं की एक लंबी सूची है, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक विवादास्पद व्यक्ति के रूप में याद किए जाने के लिए पर्याप्त है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने विवादास्पद फैसलों और कार्यकलापों के कारण अपनी उपलब्धियों की आभा खोते जा रहे हैं। यही नहीं, धार्मिक ध्रुवीकरण और एक वर्ग विशेष के पक्ष में खड़े होने के कारण वे आम जनता की नजर में भी अपनी लोकप्रियता खोते जा रहे हैं। इसका प्रमाण वर्ष 2024 का चुनाव है। वर्ष 2014 की सुनामी लहर और 2024 का सन्नाटा इस अंतर को समझने के लिए काफी है।

आज की तारीख में, पिछड़ी जाति से आने के बावजूद, वे उस वर्ग की सहानुभूति से भी दूर होते जा रहे हैं। बिहार में सुनामी जैसे चुनाव परिणाम और जीत के बावजूद, पिछड़ों के बीच उनकी लोकप्रियता वैश्य समाज तक सीमित दिखाई देती है। यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में किसी वर्ग को सर्वाधिक लाभ हुआ है, तो वह वैश्य समाज है।

देश में जीएसटी को कम करने और इससे आम लोगों को महंगाई से राहत मिलने का जितना ढिंढोरा पीटा गया, उसकी सच्चाई को आज जमीन पर देखने की आवश्यकता है। यदि अन्य सभी विषयों को छोड़ भी दिया जाए, तो जीवन रक्षक दवाओं के मामले में ही देख लिया जाए कि जीएसटी में कमी का वास्तविक असर दवाओं की कीमतों पर कितना पड़ा है। यह सरकार या सरकार के शुभचिंतक जांच कर बता सकते हैं। सच्चाई यह है कि जीएसटी में मिली छूट से अधिक दवाओं की कीमतें बढ़ी हैं, लेकिन इस पर चुप्पी साध ली गई है। इसके पीछे चुनावी चंदा है या कोई आंतरिक सांठगांठ, यह भी विचारणीय प्रश्न है।

बाजार के अन्य सामानों की कीमतों में कितनी गिरावट आई, इसका भी आकलन किया जाना चाहिए। ऑटोमोबाइल सेक्टर में कीमतों में कमी का हवाला दिया जा सकता है, लेकिन यह राहत कितने समय तक और कितनी लाभप्रद होगी, इसका अनुमान लगाना भी कठिन है।

वी बी जी राम जी योजना के नए नामकरण के साथ जो नई सोच और परिवर्तन किए जा रहे हैं, यदि उनका हाल भी कभी इंदिरा आवास योजना के नाम से शुरू हुई प्रधानमंत्री आवास योजना जैसा हुआ, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की लोक कल्याणकारी योजनाओं को लेकर जो सोच है, वह किसी से छुपी नहीं है। भले ही सरकार और उसके शुभचिंतक इन योजनाओं को लूटपाट का अड्डा बताकर राज्यों के हवाले कर दें, तो इसमें कोई बड़ी बात नहीं होगी। सच्चाई यह है कि केंद्र सरकार ऐसी योजनाओं से धीरे-धीरे अपना हाथ खींच रही है।

सबसे दुखद पहलू यह है कि ईडी और सीबीआई का राजनीतिक उपयोग करने वाली यह सरकार भ्रष्टाचार के वास्तविक मामलों में इन एजेंसियों का उपयोग न के बराबर कर रही है। यही कारण है कि सरकार भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के बजाय योजनाओं को ही ठंडे बस्ते में डाल देना चाहती है। वी बी जी राम जी को लेकर संसद में पारित किया गया विधेयक इसी दिशा में एक कदम प्रतीत होता है।

सच यह है कि भारतीय जनता पार्टी गरीबों के कल्याण के नाम पर उसे पांच किलो मुफ्त अनाज तक सीमित कर देना चाहती है। यदि पिछड़ा वैश्य समाज इस देश में अंबानी-अडानी जैसे पूंजीपतियों के हित में कानून बनाए जाने से, जल-जंगल और प्राकृतिक संसाधनों को उनके हवाले किए जाने से, सरकारी उपक्रमों के निजीकरण से, बैंक और एलआईसी की पूंजी निजी निवेश के हवाले किए जाने से खुश है, तो इस पर कुछ कहना शायद उचित नहीं होगा।

यदि एक पिछड़े समाज से आने वाला प्रधानमंत्री सरकारी नौकरियों में ओबीसी और सामान्य वर्ग के कटऑफ को बराबरी पर लाने से, संविधान और नागरिक अधिकारों की सीमाएं कम करने से संतुष्ट है, तो इसका फैसला अंततः समय के हवाले ही छोड़ देना उचित होगा।

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