रनवे पर उतरा सपना, इतिहास के पन्नों में दर्ज हुआ जेवर
- साल 2001 में बोया गया सपना 2026 में जाकर हकीकत बना। कई सरकारें बदलीं, चुनौतियां आईं, लेकिन परियोजना का सफर नहीं रुका
नोएडा ( उत्तर प्रदेश) : 15 जून यानी सोमवार की सुबह जेवर के लिए किसी आम दिन की तरह नहीं थी। सूरज की पहली किरणों के साथ हजारों आंखें उस रनवे की ओर लगी थीं, जिसका सपना इस इलाके ने करीब 25 साल पहले देखा था। सुबह ठीक 8:05 बजे जैसे ही लखनऊ से उड़ान भरकर पहली कमर्शियल फ्लाइट नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के रनवे को छूती है, वैसे ही केवल एक विमान नहीं उतरता, बल्कि एक चौथाई सदी पुराना सपना हकीकत में बदल जाता है।
यह कहानी सिर्फ एक एयरपोर्ट बनने की नहीं है। यह कहानी उस जेवर की है, जिसने आजादी के बाद लंबे समय तक पिछड़ेपन, बेरोजगारी और सीमित अवसरों का दौर देखा। यह कहानी उन लोगों की है, जिन्होंने वर्षों तक विकास की राह देखी और यह भी नहीं जानते थे कि एक दिन उनका इलाका दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण हवाई नक्शों में शामिल होने वाला है।

इस ऐतिहासिक सफर की शुरुआत वर्ष 2001 में हुई थी। उस समय उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जेवर में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा विकसित करने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा। प्रस्ताव तो भेज दिया गया, लेकिन आने वाले वर्षों में यह महत्वाकांक्षी योजना फाइलों और सरकारी प्रक्रियाओं के बीच उलझकर रह गई।
समय आगे बढ़ता रहा। सरकारें बदलीं, प्राथमिकताएं बदलीं, लेकिन जेवर एयरपोर्ट का सपना अधूरा ही रहा। फिर वर्ष 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनी। स्थानीय सांसद डॉ. महेश शर्मा को नागरिक उड्डयन मंत्रालय में जिम्मेदारी मिली और वर्षों से धूल खा रही फाइलों में फिर हलचल शुरू हुई। हालांकि परियोजना की असली किस्मत वर्ष 2017 में बदली, जब योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट जेवर में ही बनेगा और किसी भी कीमत पर परियोजना को आगे बढ़ाया जाएगा।
इसके बाद शुरू हुआ सबसे कठिन अध्याय-जमीन अधिग्रहण का। जेवर क्षेत्र के छह गांवों के करीब 3000 किसान परिवारों ने देश और प्रदेश के विकास के लिए अपनी पुश्तैनी जमीनें सौंप दीं। यह केवल जमीन का हस्तांतरण नहीं था, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए किए गए एक बड़े त्याग का उदाहरण था। किसानों के इसी सहयोग ने उस सपने को जमीन दी, जो बाद में विशाल एयरपोर्ट के रूप में आकार लेने वाला था।
मई 2018 में नागरिक उड्डयन मंत्रालय से परियोजना को सैद्धांतिक मंजूरी मिली। इसके बाद वर्ष 2019 में स्विट्जरलैंड की ज्यूरिख इंटरनेशनल एजी को 40 वर्षों के लिए एयरपोर्ट के विकास और संचालन का अनुबंध दिया गया। वर्ष 2020 तक छह गांवों की 1334 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण पूरा हो गया और निर्माण की राह साफ हो गई।
25 नवंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस ड्रीम प्रोजेक्ट का शिलान्यास किया। निर्माण की जिम्मेदारी टाटा प्रोजेक्ट्स को सौंपी गई। लेकिन इसके बाद भी राह आसान नहीं थी। कोविड-19 महामारी ने काम की गति प्रभावित की। कई बार प्रदूषण नियंत्रण के तहत लागू जीआरएपी (GRAP) नियमों के कारण निर्माण गतिविधियां प्रभावित हुईं। तय समयसीमाएं आगे बढ़ीं, लेकिन परियोजना कभी रुकी नहीं।
वर्ष 2026 इस सपने को मंजिल तक पहुंचाने वाला साल साबित हुआ। 5 और 6 मार्च को एयरपोर्ट को दो महत्वपूर्ण मंजूरियां मिलीं। ब्यूरो ऑफ सिविल एविएशन सिक्योरिटी (बीसीएएस) ने सुरक्षा स्वीकृति प्रदान की, जबकि नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) ने एयरोड्रम लाइसेंस जारी किया। इसके साथ ही व्यावसायिक उड़ानों का रास्ता लगभग साफ हो गया।
मई 2026 में भारतीय नागरिक नीतू सामरा को एयरपोर्ट का नया मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया गया। इसी दौरान इंडिगो और अकासा एयर ने यहां से उड़ानों की बुकिंग शुरू कर दी। इससे साफ हो गया कि अब सपना और हकीकत के बीच की दूरी बहुत कम बची है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने निर्माण कार्य के दौरान कई बार औचक निरीक्षण किए। सुरक्षा एजेंसियों से अंतिम मंजूरियां मिलने के बाद 28 मार्च 2026 को इस भव्य एयरपोर्ट का लोकार्पण किया गया। इसके बाद पूरा क्षेत्र उस दिन का इंतजार करने लगा, जब पहली व्यावसायिक उड़ान यहां उतरेगी।
15 जून की सुबह 8:05 बजे लखनऊ से उड़ान भरकर आई पहली कमर्शियल फ्लाइट जैसे ही नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के रनवे पर उतरी, जेवर का नाम हमेशा के लिए दुनिया के नक्शे पर दर्ज हो गया। वर्षों से अधूरा पड़ा सपना आखिरकार पूरा हो चुका था।


